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का निपटारा करने का अधिकार इस परिषद को दिया गया। साथ ही कहा गया
कि इसके निर्णय दोनों पक्षों को मान्य होंगे। इस प्रकार युद्ध का खतरा सदा के
लिए शांत हो गया।’’
- जो कपिलवस्तु में हुआ था उसे गौतम को बताने के बाद परिव्राजकों ने कहा-‘‘अब
तुम्हें परिव्राजक के रूप में रहने की आवश्यकता नहीं है। अब क्यों नहीं अपने
घर जाकर अपने परिवार में सम्मिलित हो जाते?’’
- सिद्धार्थ ने कहा-‘‘इस समाचार से मुझे खुशी हुई। यह मेरी विजय है। लेकिन
मैं अपने घर लौटकर नहीं जाऊँगा। मुझे जाना भी नहीं चाहिए। मुझे परिव्राजक
ही बने रहना चाहिए।’’
- गौतम ने पांचों परिव्राजकों से पूछा-‘‘आपका क्या अभिप्राय है?’’ उन्होंने उत्तर
दिया, ‘‘हम लोगों ने तपस्या करने का निर्णय लिया है। तुम हम लोगों के साथ
क्यों नहीं आ जाते हो।’’ सिद्धार्थ ने उत्तर दिया ‘‘धीरे-धीरे, मुझे पहले दूसरे
पथों की परीक्षा करनी चाहिए।’’
- तब पाँचों परिव्राजक चले गए।
6. नए परिप्रेक्ष्य में समस्या
- पाँचों परिव्राजकों द्वारा दिए गए समाचार से कि कोलियों और शाक्यों के बीच
शांति स्थापित हो गई है, गौतम बहुत बेचैन हो उठा।
- अकेले में वह अपनी स्थिति के बारे में सोचने लगा कि क्या अभी भी उसके
परिव्राजक बने रहने का कोई ठोस कारण है।
- उसने अपने आप से पूछा- ‘‘वह अपने बन्धु-बान्धवों को किसलिए छोड़ कर
आया था?’’
- उसने इसलिए अपना घर छोड़ा था, क्योंकि उसने युद्ध का विरोध किया था।
‘‘अब जबकि युद्ध समाप्त हो गया है, तब भी क्या मेरे लिए कोई समस्या शेष
बची है? क्या युद्ध की समाप्ति के साथ-साथ मेरी समस्या भी समाप्त हो गई
है?’’
गहन चिन्तन में उसे उत्तर नहीं मिला।
‘‘युद्ध की समस्या निश्चित रूप से विरोध की समस्या है। यह एक बड़ी समस्या
का अंग मात्र है।’’