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3. समाधि-मार्ग का प्रशिक्षण
- जिस समय गौतम अपनी समस्या के समाधान के लिए विभिन्न प्रकार के मार्गों
का परीक्षण कर रहा था, उस समय उसने विचार किया कि मुझे ध्यान-मार्ग
(चित्त की एकाग्रता) का ढंग भी क्यों न सीख लेना चाहिए। 2. ध्यान-मार्ग की तीन विधियाँ थीं।
- तीनों में एक चीज समान थी कि साँस पर नियंत्रण पा लेने से चित्त की एकाग्रता
सिद्ध हो जाती थी।
- साँस को नियंत्रण में करने की एक विधि ‘आनापानसति’ कहलाती थी।
- साँस को नियंत्रण में करने की दूसरी विधि प्राणायाम कहलाती थी। यह साँस
लेने की प्रक्रिया को तीन भागों में बाँटती थी-1. साँस लेना (पूरक), 2. साँस
रोके रखना (कुम्भक), 3. साँस बाहर निकालना (रेचक)। तीसरी विधि समाधि
पद्धति कहलाती थी।
- आलार कालाम ध्यान-मार्ग में दक्ष माना जाता था। गौतम ने अनुभव किया कि
यह अच्छा होगा, यदि वह आलार कालाम के निरीक्षण में ध्यान-मार्ग का कुछ
प्रशिक्षण ले।
- इसलिए उसने आलार कालाम से कहा कि यदि आप मुझे ध्यान-मार्ग में प्रशिक्षण
दिला दें तो अच्छा होगा।
आलार कालाम ने उत्तर दिया-‘‘बड़ी खुशी से।’’
आला कालाम ने उसे ध्यान-मार्ग की विधि बताई। इसके सात सोपान थे।
गौतम ने इस विधि का प्रतिदिन अभ्यास किया।
इसमें पूर्ण दक्षता प्राप्त करने के बाद गौतम ने आलार कालाम से पूछा कि
‘‘इसमें सीखने के लिए कुछ और शेष है?’’
- आलार कालाम ने उत्तर दिया-‘‘नहीं मित्र! मुझे केवल इतना ही बताना था।’’
इसके साथ ही गौतम ने आलार कालाम से बिदा ली।
- गौतम ने उद्दक रामपुत्त नामक एक दूसरे योगी के बारे में सुना था जिसने एक
ऐसी विधि का आविष्कार किया है, जो ध्यानी को आलार कालाम की विधि
से एक सोपान ऊपर ले जाती है।
- गौतम ने इस विधि को सीखकर समाधि के उच्चतम सोपान पर अनुभव करने