64 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
की सोची। तदनुसार वह उद्दक रामपुत्त के आश्रम में गया और अपने को उनके
अधीन प्रशिक्षण में लगा दिया।
- कुछ ही समय में गौतम ने उद्दक के आठवें सोपान की विधि में दक्षता प्राप्त
कर ली। उद्दक रामपुत्त की विधि में पूर्णता प्राप्त करने के बाद गौतम ने ठीक
वही प्रश्न किया, जो उसने आलार कालाम से किया था-‘‘इससे आगे भी कुछ
सीखने के लिए शेष है?’’
- और उद्दक रामपुत्त ने भी वहीं उत्तर दिया-‘‘नहीं मित्र! जो मैंने तुम्हें सिखाया
उससे ज्यादा कुछ नहीं है।’’
- आलार कालाम और उद्दक रामपुत्त कोसल जनपद में ध्यान-मार्ग में दक्षता
के लिए प्रसिद्ध थे। लेकिन गौतम ने मगध जनपद में भी ध्यान-मार्ग के वैसे
ध्यानाचार्यों के बारे में सुना था। उसने सोचा कि उनकी पद्धति में भी प्रशिक्षण
लेना चाहिए।
तदनुसार गौतम मगध गया।
उसने देखा कि सांस नियंत्रण से ध्यान-मार्ग की उनकी विधि कोसल जनपद
में प्रचलित विधि से सर्वथा भिन्न थी।
- इस ध्यान विधि की विशेषता यह थी कि यह साँस का सर्वथा निरोध करके
चित्त की एकाग्रता का सम्पादन करती थी।
- गौतम ने इस विधि को सीखा। साँस को रोक कर, जब उसने चित्त को एकाग्र
करने की कोशिश की, तो उसे लगा कि उसके कानों से तीक्ष्ण आवाज रही है
और अपना सिर उसे ऐसा अनुभव हो रहा था, जैसे तेज चाकू से कोई उसके
सिर को चीर रहा हो।
- यह बड़ी कष्टदायक विधि थी। लेकिन गौतम इसमें भी दक्षता प्राप्त कर सफलता
प्राप्त कर ली।
- इस प्रकार उसने समाधि-मार्ग का प्रशिक्षण लिया।
4. तपश्चर्या का परीक्षण
- गौतम ने सांख्य और समाधि-मार्ग का परीक्षण कर लिया था। लेकिन तपश्चर्या
के परीक्षण के बिना ही उसने भृगु ऋषि का आश्रम छोड़ दिया था।
- उसे लगा कि उसका भी परीक्षण करना चाहिए और अपने लिए अनुभव प्राप्त
करना चाहिए, ताकि उस बारे में वह अधिकार पूर्वक चर्चा कर सके।