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- तदनुसार गौतम गया नगर पहुंचा। वहां पहुंचकर उसने आसपास के क्षेत्र को
ध्यानपूर्वक देखा और तपश्चर्या हेतु उरुबेला में गया के राजर्षि नेगरी के आश्रम
में रहने का निश्चय किया। तपश्चर्या अभ्यास के लिए नेरंजना नदी के किनारे
स्थित यह स्थान एकांत तथा शांत था।
- उरुबेला में उसे वे पाँच परिव्राजक भी मिले, जो पहले राजगृह में मिले थे और
जिन्होंने उसे शांति का समाचार लाकर सुनाया था। वे भी वहां तपश्चर्या का
अभ्यास कर रहे थे।
- उन तपस्वियों ने उसे वहाँ देखा, उसके पास वे गए और उन्हें भी अपने साथ
रहने को कहा। गौतम तैयार हो गया।
- उसके बाद उन्होंने आदरपूर्वक उसकी सेवा की और उसके शिष्यों की तरह
उसकी आज्ञा मानने लगे और वे बहुत ही विनम्र और आज्ञाकारी थे।
गौतम की तपस्था और आत्म-संताप की विधि काफी कठिन थी।
प्रतिदिन वह सात घरों से ज्यादा भिक्षाटन के लिए नहीं जाता था और कभी-कभी
तो सिर्फ दो घर तक ही। और प्रत्येक घर से वह सात कौर से ज्यादा भोजन
नहीं लेता था और कभी-कभी तो केवल दो कौर ही।
- प्रतिदिन वह एक कटोरी खाना खाकर रहता था, लेकिन सात कटोरी से ज्यादा
किसी भी हालत में नहीं।
- कभी-कभी वह एक दिन में एक बार भोजन करता था, कभी-कभी दो दिनों
में एक बार और इसी क्रम से कभी-कभी वह सात दिनों में एक बार भोजन
करता था या पन्द्रह दिनों में भी एक बार और बड़ी ही निश्चित मात्रा में।
- जब वह तपश्चर्या के अभ्यास में और आगे बढ़ा, तो उसका आहार मात्र इकट्ठी
हरी जड़े मात्र रह गया था, या जंगली जौ और धान के दाने या पेड़ों की छाल
के टुकड़े या जल पौधा या चावल की भूसी के अन्दर का लाल कण या
उबालने पर चावल के बचे भाग या सरसों आदि की खली।
वह जंगली जड़ें और फल या हवा से गिरे फल-फूल खाकर रहने लगा था।
उसके कपड़े या तो सन के बने थे या कूड़े के ढेरों पर पड़े सन मिश्रित चीथड़ों
के या पेड़ की छाल के या आधे या पूरे काले मृग-छाल के या घास के या
छाल के, लकड़ी की पट्टियों के या आदमियों और पशुओं के बालों से बने
कम्बलों के या उल्लू के परों के बने होते थे।