5. तपश्चर्या का त्याग - Page 95

66 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. वह अपने सिर और अपनी दाढ़ी के बाल नोच-नोच कर उखाड़ता था। वह

हमेशा सीधा और पालथी मारकर बैठता था, वह खड़ा कभी नहीं होता था और

सरक कर चलता था।

  1. इस प्रकार से और अनेक तरह से वह अपने शरीर को कष्ट पहुँचाता था। उसकी

तपश्चर्या इस सीमा तक आ गई थी।

  1. अपने शरीर के प्रति उपेक्षा के भाव को वह इस सीमा तक ले गया कि वर्षों

तक उसके शरीर पर मैल जमती रही और बाद में वह स्वयं गिरने लगी।

  1. वह विस्मयकारी घनघोर जंगल में रहता था, ऐसा विस्मयकारी घनघोर जंगल

कि पागल के सिवा उसमें कोई नहीं जा सकता था। यदि जाएगा तो भय के

कारण रोंगटे खड़े हो जायेंगे।

  1. जब शीत ऋतु की भयानक ठंडी रातें आती, तो महीनों के कृष्ण पक्ष में वह

रात में खुले आसमान के नीचे और दिन के समय घुप्प अंधेरे में रहता था।

  1. लेकिन जब वर्षा ऋतु से पहले भयानक गरमी पड़ने लगती, तो वह दिन की

चिलचिलाती धूप में रहता और रात में गर्मी भरे घने जंगलों में रहता।

  1. वह शमशान भूमि में मुर्दों की हड्डियों का तकिया बनाकर लेटता था।

  2. उसके बाद गौतम प्रतिदिन एक ही फली खाकर रहने लगा-बाद में तिल का

एक बीज प्रतिदिन खाकर या चावल का एक दाना प्रतिदिन खाकर।

  1. जब प्रतिदिन वह एक ही फल खाकर रहता था, तो उसका शरीर एकदम

कमजोर हो गया।

  1. यदि वह अपने पेट का स्पर्श करना चाहता था, तो उसका हाथ उसकी पीठ

को जा लगता और अगर वह पीठ को स्पर्श करना चाहता था, तो उसके हाथ

में पेट आ जाता था, उसका पेट और पीठ दोनों एक दूसरे के निकट आ गए

थे और ऐसा उसके कम खाने के कारण ही हुआ।

5. तपश्चर्या का त्याग

  1. गौतम की तपश्चर्या और आत्म-पीड़न बड़े ही उग्र रूप का था, जो छह वर्ष

के लम्बे समय तक जारी रहा।

  1. छह वर्ष के बाद उसका शरीर इतना दुर्बल हो गया था कि वह चलने-फिरने

में भी असमर्थ हो गया था।