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- फिर भी उसे कोई नया प्रकाश और संसार के दुःख की समस्या का समाधान
दिखाई नहीं दे रहा था, जिस पर उसका मन केंद्रित था।
- उसने अपने मन में विचार किया कि-‘‘यह न कामवासना से छुटकारे का मार्ग
है, न यह पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने का और न मोक्ष का मार्ग है।’’
- कुछ लोग इस संसार के सुख-भोग हेतु कष्ट झेलते हैं, कुछ स्वर्ग के लिए
कष्ट सहन करते हैं। सभी प्राणी आशा के चक्कर में पड़कर अपने उद्देश्य को
प्राप्त न हो, सुख को खोजते हैं और विपत्ति में फंस जाते हैं।
क्या मेरे साथ भी कुछ-कुछ ऐसा ही नहीं हुआ है?
मैंने जो प्रयास किया है, मैं उसे दोष नहीं दे रहा हूँ, लेकिन आधार छोड़कर
वह आकाश में उड़ने का प्रयास है।
मैं पूछता हूँ-क्या शरीर के संताप का धर्म कहा जा सकता है?
चूँकि शरीर के काम करने या न करने पर मन का अधिकार होता है, इसलिए
विचार पर नियंत्रण ही उचित है। बिना विचार के शरीर कर्त्ता के समान है।
- यदि केवल शरीर पर विचार करें, तो भोजन की शुद्धि से ही पवित्रता आ सकती
है, लेकिन जो कर्त्ता (मन) है, उसकी पवित्रता की भी तो बात है। लेकिन यह
सब किस काम की?
- जिसने अपनी शारीरिक शक्ति खोज ली है, जो भूख-प्यास और थकान से चूर
है, थकान के कारण उसका मन एकाग्र और शान्त नहीं होता, ऐसे आदमी को
नया प्रकाश भी प्राप्त नहीं हो सकता।
- जो पूर्णतः शांत नहीं है, जो मन द्वारा प्राप्त होने योग्य है, वह ऐसे उद्देश्य को
कैसे पा सकता है?
- ‘‘सच्ची शांति और मन की एकाग्रता को सही रूप में प्राप्त करने के लिए
शारीरिक आवश्यकताओं की लगातार पूर्ति आवश्यक है।’’
- उस समय उरुबेला में सेनानी नामक गृहपति रहता था। सुजाता उसकी बेटी
थी।
- सुजाता ने न्यग्रोध वृक्ष से पुत्र पाने की इच्छा व्यक्त की थी और संकल्प लिया
था कि यदि इच्छा पूरी हुई, तो वह हर वर्ष उसकी पूजा करेगी।
- उसकी इच्छा पूरी हो गई, इसलिए उसने अपनी दासी पुण्णा को पूजा के लिए
स्थान तैयार करने को भेजा।