अछूत और ब्रिटिश सरकार - Page 100

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मानता हूँ कि उनसे मुझे नहीं लगता कि जो नीति स्थापित की गयी थी उससे अपेक्षित लाभ प्राप्त हुआ है जबकि शुल्क में अपेक्षित वृद्धि का लक्ष्य पूरा होने वाला है।

फ्ग्यारहवाँ पैराग्राफः मेरा विश्वास है कि हम निम्न वर्ग के लोगों को अपने बच्चे हमारे स्कूलों में भेजने के लिए प्रेरित करें, जो बहुत कम करते हैं और यदि हम शिक्षा के मामले में सफल होना चाहते हैं, तो हमें श्रमिक वर्ग के मानसिक स्तर को ऊँचा करने का प्रयास करना चाहिए और ज्यादा धनी वर्ग की ओर ध्यान नहीं देना चाहिए।य्

फ्बारहवाँ पैराग्राफः इससे समाज पर अनुकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। हमारी सरकार निम्न वर्ग के उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों की इस प्रकार जागृत की गयी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकेगी।य्

फ्तेरहवाँ पैराग्राफः गरीब लोगों को उच्च शिक्षा देने से आम लोगों पर उनका काफी प्रभाव हो जाएगा और इस प्रकार गरीब लोगों में असन्तोष बढ़ेगा।य्

फ्चौदहवाँ पैराग्राफः शिक्षा और सभ्यता उच्च वर्गों से निम्न की ओर आनी चाहिए और इससे शक्ति का संचार होगा, किन्तु शिक्षा और सभ्यता का प्रसार निम्न वर्गों से उच्च वर्गों में नहीं हो सकता, शिक्षा और सभ्यता केवल निम्न वर्गों को प्रदान की जाती है तो इससे खलबली होगी जिसकी लपेट में सबसे पहले विदेशी आएँगे।य्

फ्पन्द्रहवाँ पैराग्राफः यदि हम शिक्षा का प्रसार करना चाहते हैं तो हमें पहले उच्च वर्गों को शिक्षा देने का प्रयास करना चाहिए।य्

फ्सोलहवाँ पैराग्राफः ऐसा करने के दो तरीके हैंµ एक तो कॉलेजों की स्थापना करके, जिसमें केवल उच्च वर्गों के छात्रों को ही दाखिल किया जाये और दूसरा सेना का पुनर्गठन करके जसमें मूल निवासियों के बेटों को जो योग्य हों, तुरन्त कमीशन दिया जाये।य्

  1. यूरोपीय अधिकारियों का अछूतों के प्रति यह द्वेष-भाव अन्ततः भारत के लिए सचिव द्वारा 1859 के अपने इस डिस्पैच में समाप्त किया गया, जिसमें यह दोहराया गया कि लोगों को शिक्षा देना सरकार की जिम्मेदारी है।

  2. यह बड़ी विचित्र बात है कि सरकार द्वारा यह मान लिए जाने पर भी कि आम लोगों को शिक्षा देना सरकार की जिम्मेदारी है, दलित वर्गों को नाम मात्र ही लाभ हुआ। इसका कारण यह है कि यद्यपि विभिन्न जिलों में आम जनता के लिए विद्यालय खोले गये। दलितों के बच्चों को इन विद्यालयों में दाखिले का प्रश्न सुलझ नहीं पाया। इस प्रकार का प्रश्न वास्तव में 1856 में उठा था, लेकिन सरकार का फैसला दलित वर्गों के पक्ष में नहीं था, जैसा कि डायरेक्टर ऑफ पब्लिक इन्स्ट्रक्शन की बम्बई पारसीडेंसी के बारे में 1856-57 की रिपोर्ट के निम्नलिखित उद्धरणों से स्पष्ट हो जाता हैµ