84 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
कॉलेजों में शिक्षा
1881-82
विद्यार्थियों की संख्या विद्यार्थियों का प्रतिशत
ईसाई 14 3
ब्राह्मण 241 50
अन्य हिन्दूः किसान 5 1
निम्न जातियाँ 0 0
अन्य जातियाँ 103 21.3
पारसी 108 21.5
मुसलमान 7 1.5
आदिवासी व पहाड़ी 0 0.0
कबीले
अन्य (यहूदियों आदि 2 0.4
को मिलाकर
इन आँकड़ों से क्या पता चलता है? इनसे यह पता चलता है कि सरकार की नीति जनसाधारण को शिक्षा देने की थी। आम जनता 1854 से पहले की भाँति तब भी शिक्षा से वंचित थी। शिक्षा के मामले में हिन्दुओं की निम्नतम जातियों और आदिवासियों का प्रतिशत सबसे कम था। यहाँ तक कि 1881-82 में इस प्रेसीडेंसी के हाई स्कूलों और कॉलेजों में इन समुदायों का कोई भी विद्यार्थी नहीं था। शिक्षा के मामले में दलित वर्गों को अन्य वर्गों के स्तर तक लाने में यह असफलता किन कारणों से रही? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए इस प्रेसीडेंसी की शिक्षा नीति के इतिहास में पुनः जाना आवश्यक है।
कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के वर्ष 1854 के डिस्पैच में 40 वर्ष के अन्तराल के पश्चात् प्रथम बार यह स्वीकार किया गया कि जनसाधारण को शिक्षा देना सरकार का कर्तव्य है। लेकिन अभी तक कुछ ऐसे हठधर्मी लोग थे जिन्हें इस डिस्पैच में उल्लिखित सिद्धान्त की उपयुक्तता पर सन्देह था और जो इस नीति को बदलने के लिए आन्दोलन चला रहे थे। पिछड़े वर्गों का स्तर ऊँचा उठाने के परिणामस्वरूप अंग्रेजी शासन के लिए गम्भीर होने का डर अभी भी नियन्त्रण बोर्ड के अध्यक्ष लॉर्ड ऐलनबोरो जैसे लोगों के मन में छाया हुआ था, जिन्होंने कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के चेयरमैन को दिनांक 24 अप्रैल 1858 को लिखे अपने पत्र में निम्नलिखित चेतावनी देने में आनाकानी नहीं कीµ फ्सज्जनों, 1854 में कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के द्वारा भेजे गये अनुदेशों के तहत भारत के विभिन्न भागों में शिक्षा की स्थिति की पुनरीक्षा करने के बारे में मुझे कई पत्र मिले हैं और मैं