अछूत और ब्रिटिश सरकार - Page 101

86 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

पैराग्राफ 177ः निम्न जातियों और जंगली कबीलों के विद्यालय µ सरकार द्वारा सीधे निम्न वर्ग के लिए विद्यालय स्थापित नहीं किये गये हैं और उच्चतम सरकार ने ऐसे विद्यालयों के लिए स्वीकृति नहीं दी है। सरकार द्वारा पूर्णतः समर्थित सामान्य विद्यालय सिद्धान्ततः सभी जातियों के लिए खोले हैं। इसी 1855-56 की रिपोर्ट के प्रेक्षण के दौरान सरकार ने निम्नलिखित आदेश जारी कियाµ फ्सरकार के समक्ष अभी तक ऐसा एक ही मामला आया है जिसमें सरकारी विद्यालयों में निम्नतम वर्ग के छात्रों के दाखिले का प्रश्न उठाया गया है और वह मामला एक महार लड़के के बारे में है जिसकी ओर से जून 1856 में एक याचिका दी गयी जिसमें शिकायत की गयी कि वह सामान्य विद्यालय शुल्क देने के लिए तैयार था फिर भी उसे धारवाड़ के सरकारी विद्यालय में दाखिला नहीं दिया गया। इस अवसर पर सरकार ने एक ऐसे प्रश्न के निर्णय में एक बड़ी व्यावहारिक कठिनाई महसूस की जिसमें सामान्य अधिकार के बारे में उनकी धारणाएँ मूल निवासियों की सामान्य अनुभूतियों से मेल नहीं खाती थीं जिनकी अधिक से अधिक चेतना के लिए सरकारी शिक्षा विभाग की स्थापना की गयी है और यह फैसला किया गया जो उस समय कुछ हिचकिचाहट के साथ पारित प्रस्ताव से भी स्पष्ट हो जाता है कि एक व्यक्ति को केवल एक महार को जो सवर्ग जातियों के छात्रों के स्कूल में दाखिला लेने आया है, दाखिला देना और उनके साथ मिल-जुल कर रहने के लए बाध्य करना उचित नहीं होगा क्योंकि इससे मूल निवासियों के लिए संस्था के वास्तव में बेकार हो जाने की सम्भावना है।य्

इस मामले में बम्बई सरकार की कार्यवाही दिनांक 23 जनवरी, 1857 के पत्र संख्या 111 में निम्नलिखित शब्दों में भारत सरकार द्वारा नोट की गयीµ

फ्गवर्नर जनरल इन काउंसिल का विचार है कि सम्भवतः बम्बई सरकार ने इस मामले में विवेक से काम लिया, लेकिन वह चाहता है कि मैं भारत सरकार का सचिव यह कहूँ कि बंगाल प्रेसीडेंसी के किसी सरकारी स्कूल में इस लड़के को दाखिला देने से इन्कार नहीं किया गया होता।य् दिनांक 28 अप्रैल, 1858 के डिस्पैच में कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने इस विषय पर निम्न आदेश पारित कियाµ

फ्सरकार की सभी शिक्षण-संस्थाएँ, हमारी ओर से सभी वर्गों के लिए खुली हैं और हम एक ऐसे सिद्धान्त से विमुख नहीं हो सकते, जो पर्याप्त उचित है और जिसे लागू करना महत्त्वपूर्ण प्राथमिकता है। यह असंभव नहीं है कि कुछ मामलों में, सिद्धान्त लागू होने के बाद कुछ छात्र विद्यालय छोड़ दें। लेकिन इस बारे में यह टिप्पणी पर्याप्त है कि जो व्यक्ति इसके व्यवहार में लागू करने पर आपत्ति करें, वे अपना अंशदान वापस ले सकते हैं और उस राशि को अन्य प्रकार के स्कूल बनाने पर खर्च कर सकते हैं।य्

इस पत्र के प्राप्त होने पर यह निश्चय किया गया कि भारत सरकार को आश्वस्त