अछूत और ब्रिटिश सरकार - Page 102

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किया जाए कि जाति के मामले में इस समय भारत में जो विशिष्ट विद्यालय हैं, उनको कम विशिष्ट बनाने के लिए यह सरकार हर सम्भव उपाय करेगी। बशर्ते कि ऐसा करने से सरकारी स्कूलों की बदनामी न हो, उनकी कार्यकुशलता पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े और वह उद्देश्य ही समाप्त न हो जाये जिसके लिए इनकी स्थापना की गयी है। यह भी निश्चय किया गया कि सरकारी विद्यालयों की सामान्य उपयोगिता के सन्दर्भ में बंगाल में लागू सिद्धान्त के व्यावहारिक पहलुओं की जाँच की जाये।

  1. बंगाल में प्रचलित प्रभाव की जाँच से पता चला कि भारत सरकार के आदेश के विपरीत वहाँ के अधिकारियों ने जिला शिक्षा समितियों को प्रत्येक मामले में स्थानीय मूल निवासियों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए निम्न जातियों के उम्मीदवारों को दाखिला देने अथवा न देने का अधिकार दे दिया था। इसका परिणाम यह हुआ कि दलितों को निरुत्साहित छोड़ दिया गया था क्योंकि सवर्ण लोगों ने उन्हें ज्ञान की उस आग पर नहीं बैठने दिया, जो सरकार ने जनता के हित में जलाई थी।

  2. इन हालातों में 1854 के डिस्पैच में परिकल्पित जन शिक्षा वास्तव में दलित वर्गों को छोड़ कर बाकी सब को उपलब्ध थी। 1854 में दलित वर्गों की शिक्षा पर लगे प्रतिबन्ध को हटाने से कोई विशेष अन्तर नहीं पड़ा। इसका कारण यह था कि यद्यपि सरकार ने बहिष्कृत न करने का सिद्धान्त स्वीकार कर लिया था पर इसे वास्तव में लागू नहीं किया गया और इस प्रकार हम कह सकते हैं कि प्रतिबन्ध पहले की तरह ही जारी रहा। दलित वर्गों को शिक्षा देने का काम केवल ईसाई मिशनरी ही कर सके। सर माउंट स्टूअर्ट एलफिंस्टन के शब्दों में कि उन्होंने निम्नतम वर्गों में सर्वोत्तम छात्र पाए हैं, लेकिन सरकार ने धर्म के मामले में दखल न देने की कसम खाई थी और इसलिए मिशनरी स्कूलों का समर्थन नहीं कर सकती थी। यही कारण है कि इस अवधि के आरम्भ में इस प्रेसीडेंसी के किसी मिशनरी विद्यालय को कोई आर्थिक सहायता नहीं दी गयी, यद्यपि 1854 के शिक्षा डिस्पैच द्वारा मिशनरी विद्यालयों को सहायता देने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया गया था।

  3. इस गतिरोध को दूर करने के लिए सरकार ने दो उपाय कियेµ (1) निम्न जातियों के लड़कों के लिए सरकारी विद्यालय खोले गये और (2) सहायता अनुदान के नियमों को ढीला करके मिशनरी संस्थाओं को विशेष प्रोत्साहन दिया गया। यदि ये दो उपाय न किये गये होते तो दलित वर्गों की शिक्षा का कोई परिणाम न निकलता। यह बात इस तथ्य से स्पष्ट हो जाती है कि जब हंटर कमीशन ने 1882 में स्थिति का जायजा लिया तो पता चला कि दलितों के बहुत ही कम लोग शिक्षा प्राप्त कर सके हैं।