अछूत और ब्रिटिश सरकार - Page 103

88 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

III (1882 से 1923)

  1. वर्ष 1882 के पश्चात्, वर्ष 1923 का बम्बई प्रेसीडेंसी में शिक्षा के इतिहास में बड़ा महत्त्व है। इस वर्ष प्राथमिक शिक्षा का काम प्रांतीय सरकारों से लेकर स्थानीय संस्थाओं को दे दिया गया। अतः यह उचित होगा कि 1923 में शिक्षा की स्थिति का जायजा लिया जाए। 1923 में बम्बई प्रेसीडेंसी में शिक्षा की प्रगति के मामले में विभिन्न समुदायों की स्थिति नीचे सारणी में दी गयी हैµ

प्रेसीडेंसी में जनसंख्या की शिक्षा की दृष्टि से क्रम जनसंख्या के वर्गऽ दृष्टि से क्रम प्राथमिक माध्यमिक कॉलेज

उन्नत हिंदू चौथा पहला पहला पहला मध्यवर्ती हिंदू पहला तीसरा तीसरा तीसरा दलित हिंदू दूसरा चौथा चौथा चौथा मुसलमान तीसरा दूसरा दूसरा दूसरा

  1. इस सारणी से शिक्षा के मामले में विभिन्न समुदायों की तुलनात्मक प्रगति में बड़ी विषमता का पता चलता है। आबादी की दृष्टि से और शैक्षणिक प्रगति की दृष्टि से सभी वर्गों की तुलना करने से पता चलता है कि मध्यवर्ती वर्ग, जो आबादी की दृष्टि से प्रथम स्थान पर आता है, कॉलेज शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा तथा प्राथमिक शिक्षा की दृष्टि से तीसरे स्थान पर है। दलित (पिछड़ा) वर्ग जिनका जनसंख्या की दृष्टि से दूसरा स्थान है कॉलेज शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा और प्राथमिक शिक्षा की दृष्टि से चौथे स्थान अर्थात अन्तिम स्थान पर है। मुसलमान जो जनसंख्या की दृष्टि से तीसरे स्थान पर है कॉलेज, माध्यमिक तथा प्राथमिक शिक्षा की दृष्टि से दूसरे स्थान पर है जबकि उन्नत हिन्दू जिनका जनसंख्या की दृष्टि से चौथा स्थान है कॉलेज शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा और प्राथमिक शिक्षा, सभी में प्रथम स्थान पर हैं। इन आँकड़ों के आधार पर हम कह सकते हैं कि इस सम्बन्ध में जो स्थिति 1882 में थी उसमें तुलनात्मक दृष्टि से कोई सुधार नहीं हुआ है।

  2. उपरोक्त विवरण से जो बम्बई प्रेसीडेंसी के शिक्षा निदेशक की 1923-24 की रिपोर्ट पर आधारित है, विभिन्न समुदायों की शैक्षिक प्रगति में पायी जाने वाली विषमता का पता चलता है। किन्तु विभिन्न समुदायों के शिक्षा स्तर पर विषमता कोई बड़ी बात नहीं है। हम यह जाने बिना कि कितनी विषमता है किसी महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकते। इस दृष्टि से स्थिति को स्पष्ट करने के लिए निम्नलिखित सारणी प्रस्तुत हैः

ऽ बम्बई की सरकार के शिक्षा विभाग ने, इस प्रेसीडेंसी को विभागीय उद्देश्य से चार वर्गों में वर्गीकृत

किया है। उनमें एक वर्ग ब्राह्मणों एवं संबंधित जातियों का है, जो समेकित रूप से ‘उन्नत हिंदू’ कहलाते

हैं। मराठा तथा उनसे संबंधित जातियाँ एक अलग वर्ग में है, जिसे ‘मध्यवर्ती हिंदू’ कहा जाता है। शेष

हिंदू जनसंख्या, जो दलित वर्ग, पहाड़ी जनजातियों तथा अपराधी-जातियों से संबंधित है, ‘पिछड़े वर्ग’

में आती है। इनके अलावा एक चौथा वर्ग है, जिसमें मुसलमान तथा सिंधी शामल हैं।