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कला परीक्षाओं के परिणामों पर दी जाए और कॉलेजों में धार्य हो। (9) सरकारी धन से चलाए जा रहे मुसलमानों के स्कूलों की सभी कक्षाओं में एक निश्चित निःशुल्क छात्रवृत्तियाँ विशेष रूप से आरक्षित की जाएँ। (10) उन स्थानों पर जहाँ मुसलमानों के लिए धर्मदाय है और उनका प्रबन्ध सरकार करती है वहाँ ऐसे धर्मदायों से प्राप्त होने वाला धन केवल मुसलमानों में शिक्षा प्रसार पर खर्च किया जाय। (11) जहाँ मुसलमान रहते हैं और गैर -सरकारी व्यक्तियों के प्रबन्ध में हैं वहीं सहायता अनुदान प्रणाली के आधार पर अंग्रेजी पढ़ाने वाले विद्यालय या कॉलेजों की स्थापना करने के लिए उदार सहायता अनुदान के रूप में उन्हें प्रोत्साहन दिये जाएँ। (12) जहाँ आवश्यक हो, मुसलमान अध्यापकों के प्रशिक्षण के लिए सामान्य विद्यालय अथवा कक्षाएँ स्थापित की जाएँ। (16) मुसलमानों के प्राथमिक विद्यालयों का निरीक्षण करने के लिए भविष्य में अधिक मुसलमान निरीक्षण अधिकारियों की नियुक्त की जाये। (17) स्थानीय सरकारों का ध्यान उस अनुपात के प्रश्न की ओर आकर्षित किया जाये जिसमें मुसलमानों तथा अन्य लोगों को संरक्षण दिया जाता है।
- हंटर आयोग की इन सिफारिशों में से प्रत्येक, दलित वर्गों के लाभ के लिए भी आवश्यक थीं। लेकिन जब हम, आयोग द्वारा पिछड़े वर्गों के हित में इनमें ऐसी कोई सिफारिश नहीं पाते जिसमें निर्देश दिया गया हो, कि पिछड़े वर्गों की शिक्षा पर होने वाला व्यय सरकारी कोष पर वैध प्रभार माना जाये, कि उनके छात्रवृत्तियाँ और धनराशि सुरक्षित रखी जाये, कि उनकी शिक्षा सम्बन्धी आवश्यकताओं का ध्यान रखने के लिए विशेष निरीक्षण अधिकारी रखे जाएँ या कि उनमें शिक्षा के विकास को प्रोत्साहन देकर उन्हें सार्वजनिक संरक्षण दिया जाय। हमें पता चला है कि आयोग ने केवल यह कहा है कि (1) किसी लड़के को केवल जाति के आधार पर सरकारी स्कूल या कॉलेज में दाखिला देने से मना न करने के सिद्धान्त की, एक सिद्धान्त के रूप में पुष्टि की जाये और इसे हर ऐसे संस्थान पर पूरी सावधानी से लागू किया जाये जो विशेष जातियों के लिए आरक्षित न हो और जिसका संचालन प्रांतीय नगर पालिका अथवा स्थानीय स्तर पर सरकारी खर्चे से होता है। (2) किन्हीं निम्न जातियों के बच्चों के लिए ऐसे स्थानों पर विशेष विद्यालयों या कक्षाओं की स्थापना को उदारता से बढ़ावा दिया जाय जहाँ पृथक विद्यालय या कक्षाएँ खोलने के लिए ऐसे बच्चों की पर्याप्त संख्या है और जहाँ पहले ही सरकारी धन से चल रहे विद्यालयों में उनकी शिक्षा के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। तथ्य यह है कि आयोग द्वारा मुसलमानों के लिए की गयी सिफारिशें, मुसलमानों की अपेक्षा पिछड़े वर्गों के लिए ज्यादा जरूरी थीं। यही कारण है कि हंटर आयोग को, जिसके अध्यक्ष को मुसलमानों के साथ पूरी सहानुभूति भी स्वीकार करनी पड़ी कि फ्1871-73 में की गयी जाँच से यह सिद्ध हो जाता है कि उच्च शिक्षा के अलावा, मुसलमानों के पिछड़ेपन को बढ़ा-चढ़ा कर बताने