92 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
की प्रवृत्ति रही है।य् इसके होते हुए भी हंटर आयोग ने केवल उपरोक्त दो सिफारिशें कीं। दलित वर्गों के सम्बन्ध में आयोग द्वारा की गयी इन दो सिफारियों में से भी कोई अधिक लाभ होने की सम्भावना नहीं थी अतः उनका निरर्थक जाना अवश्यंभावी था। इस सिद्धान्त की पुष्टि भी की गयी लेकिन यह बेकार थी। इसका कारण यद्यपि पाँचवीं बार यह था कि आयोग द्वारा लगाये गये प्रतिबन्धों के अनुसार इसे लागू नहीं किया जाना था। इसी प्रकार दलित वर्गों के लिए अलग विद्यालय खोलना भी सम्भव नहीं था। इसलिए इसका व्यर्थ जाना भी अवश्यंभावी था। अतिरिक्त खर्च करके अलग विद्यालय खोलना सरकार को स्वीकार्य नहीं था। सरकार के लिए तो प्राथमिक शिक्षा भी एक कठिन कार्य थी। इसके अलावा यह प्रतिबन्ध विद्यालय वहाँ खोले जाएँ जहाँ पिछड़े वर्गों की बड़ी संख्या रही है, इन सिफारिशों को नकारने के लिए पर्याप्त था, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में पिछड़े वर्ग किसी भी मोहल्ले में बड़ी संख्या में नहीं रहते हैं।
- यह समझना कठिन है कि हंटर आयोग ने पिछड़े वर्गों की शिक्षा की आवश्यकता थी और इतना कम ध्यान क्यों दिया? यदि उसने मुसलमानों के प्रति उदार होना आवश्यक समझा, तो इसे पिछड़े वर्गों के प्रति न्यायसंगत होना चाहिए था, क्योंकि वे शिक्षा, संपत्ति और सामाजिक स्तर में मुसलमानों से बहुत पीछे थे। हंटर आयोग द्वारा एक बार उपेक्षा किये जाने पर वे हमेशा उपेक्षित रहे और सरकार ने उनकी ओर कभी ध्यान नहीं दिया। इस उपेक्षा के एक उदाहरण के तौर पर भारत सरकार के शिक्षा विभाग के दिनांक 21 फरवरी, 1923 के एक संकल्प की ओर ध्यान आकर्षित किया जा सकता है। यह भारत सरकार का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण संकल्प था। इस संकल्प में भारत सरकार ने अनेक प्रांतों में व्यापक शिक्षा पद्धति का विस्तार करने के लिए धनराशि उपलब्ध हो जाने पर शाही राजस्व से बड़ी मात्रा में अनुदान देकर स्थानीय सरकार की सहायता करने का निश्चय किया था। इस संकल्प में आयोग ने ‘अधिवासी समुदाय’ और मुसलमान समुदाय की शैक्षिक आवश्यकताओं की ओर विशेष रूप से प्रांतीय सरकारों का ध्यान दिलाया था। लेकिन इस पूरे संकल्प में पिछड़े वर्गों के लिए एक शब्द भी नहीं कहा। बम्बई सरकार ने तुरन्त ही यह सुझाव स्वीकार कर लिया और मुसलमानों में शिक्षा को बढ़ावा देने के सम्बन्ध में सिफारिश करने के लए 1913 में शिक्षा समिति में एक मुसलमान की नियुक्ति की। सरकार की और से इस घोर उपेक्षा पर, विशेष रूप से जब यह महसूस किया जाता है कि 1913 के पश्चात् भारत सरकार द्वारा कलकत्ता विश्वविद्यालय में अभिभाषण का उत्तर देते समय ‘अति दयालु सम्राट’ द्वारा की गयी घोषणा को पूरा करने के लिए अनुदान के रूप में बड़ी राशि दी गयी, क्रोध आना स्वाभाविक है। इस घोषणा में उन्होंने कहा थाµ फ्यह मेरी इच्छा है कि देश में विद्यालयों और कॉलेजों का जाल फैला दिया जाये। वहाँ से सच्चे व आज्ञाकारी और उपयोगी नागरिक आगे आएँगे जो अपने उद्योगों और खेती तथा जीवन के सभी काम सँभालने के योग्य होंगे।