अछूत और ब्रिटिश सरकार - Page 108

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और मेरी यह भी इच्छा है कि ज्ञान के प्रसार और उच्च विचारों, सुख-सुविधा तथा स्वास्थ्य का प्रसार करके मेरी भारतीय प्रजा के घरों को प्रज्वलित कर दिया जाये और उनकी मेहनत से रस घोल दिया जाये। शिक्षा के माध्यम से ही मेरी इच्छा पूरी हो सकती है और भारत में शिक्षा का प्रसार ही हमेशा मेरी हार्दिक इच्छा होगी।य्

IV

अंग्रेजी शासन-काल में सामाजिक सुधारों की क्या स्थिति रही?

पिछली पीढ़ी के प्रमुख एवं प्रगतिशील हिन्दू राजा सर टी. माधव राव ने कहा थाµ

फ्कोई व्यक्ति जितने अधिक समय तक जीवित रहता है, देखता है और सोचता है उतना ही अधिक गहराई से वह महसूस करता है कि इस पृथ्वी पर ऐसा कोई समाज नहीं है, जो हिन्दू समाज की तुलना में राजनीतिक बुराइयों से कम और आत्मकृत अथवा आत्मस्वीकृत अथवा आत्मसृजित और इसलिए परिहार्य बुराइयों से अधिक पीडि़त हो।य्

इस तुलनात्मक टिप्पणी की ओर ध्यान न भी दिया जाये तो भी इसमें कोई संदेह नहीं कि हिन्दू समाज में जितनी सामाजिक बुराइयाँ हैं इतनी बुराइयाँ किसी अन्य समाज में नहीं हैं। महत्त्वपूर्ण समाज सुधारकों में महादेव गोविन्द रानाडे का नाम भी श्रद्धा से लिया जाता है। उन्होंने हिन्दू समाज के एक अन्य पहलू पर बल देते हुए समान रूप से महत्त्वपूर्ण टिप्पणी की हैµ

फ्केवल औचित्य या हानि-लाभ के विचार से एक समाज को विशेष रूप से, रूढि़ और प्रभाव से मंत्रमुग्ध हमारे जैसे समाज को सामाजिक सुधार हाथ में लेने और उन्हें निष्पादित करने के लिए प्रेरित नहीं कर सकते। हमारे लोग महसूस करते हैं और गम्भीरतापूर्वक महसूस करते हैं कि हमारी कुछ सामाजिक प्रथाएँ दोषपूर्ण हैं लेकिन चूँकि यह बुराई अल्पकालिक है, वे सोचते हैं कि ईश्वरीय आदेशों की अवहेलना करना उचित नहीं है, क्योंकि इसकी सजा अधिक गम्भीर है। सच्चाई यह है कि रूढि़वादी समाज ने अपनी जीवन-शक्ति खो दी है। यह न तो कोई सुधार कर सकता है और न ही इससे सहानुभूति रख सकता है।य्

दूसरे शब्दों में सभी सामाजिक बुराइयाँ धर्म पर आधारित हैं। एक हिन्दू पुरुष या स्त्री जो कुछ भी करते हैं, वह उसे धार्मिक प्रथा समझकर करते हैं। एक हन्दू धर्मपरायण होकर खाना खाता है, धर्मपरायण होकर पानी पीता है, धर्मपरायण होकर स्नान करता है, धर्मपरायण होकर कपड़े पहनता है। वह धर्मपरायण होकर जन्म लेता है, धर्मपरायण होकर शादी करता है और धर्मपरायण होकर ही उसे जलाया जाता है। उसके सभी कार्य पवित्र होते हैं। धर्म निरपेक्षता की दृष्टि से वे कितने ही खराब हों, उसके अनुसार वे बुरे नहीं हैं, क्योंकि उसका धर्म उनकी स्वीकृति देता है। यदि कोई व्यक्ति हिन्दू को पापी कहता है तो उसका उत्तर होता है फ्यदि मैं पापी हूँ तो मैं अपने पाप धर्मानुसार करता हूँ।य्