अछूत और ब्रिटिश सरकार - Page 121

106 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

मछलियाँ अथवा घडि़याल उसे मार डालते हैं या किसी अन्य प्रकार से वह मर जाता है, तो वह व्यक्ति या वे व्यक्ति जो इस प्रकार बलिदान देंगे, वे जानबूझ कर हत्या के दोषी होंगे और दोष सिद्ध होने पर उन्हें मृत्यु की सजा दी जा सकेगी। और इस कार्य में सहायता करने वाले या उकसाने वाले सभी व्यक्ति हत्या के सहअपराधी समझे जाएँगे और उन्हें तदनुसार सजा में विनिर्दिष्ट अपराधों और मुख्य अथवा गौण सिद्ध दोषी कैदियों पर मुकदमे चलाने का काम निजामत अदालत की कोर्ट को सौंपा जाएगा। उस कोर्ट के विधि अधिकारियों का जो भी फतवा हो, विनियम 1793 की धारा 70 के अनुसार सजा देगी अथवा किसी ऐसे कैदी का मामला परिषद के गवर्नर जनरल को भेजेगी, जो उसे कोर्ट की 1793 के विनियम 9 की धारा 79 के अनुसार दया का समुचित पात्र प्रतीत होगा।

  1. यदि कोई बच्चा अथवा कोई ऐसा व्यक्ति जो वयस्क नहीं हुआ है जैसा कि पहले बताया गया है, पानी में फेंका जाता है और वह मरने से बचा लिया जाता है या किसी तरह मरने से बच जाता है, तो वे व्यक्ति जो उसका जीवन खतरे में डालने में सक्रिय रहेंगे और इस काम में सहायता करने वाले तथा उत्प्रेरित करने वाले सभी व्यक्ति बड़े अपराध के दोषी होंगे और दोष सिद्ध होने पर उन्हें ऐसी सजा दी जा सकेगी, जो सर्किट कोर्ट अपने विधि अधिकारियों के फतवा के अनुसार मामले के फलस्वरूप और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए पर्याप्त समझें।

  2. उन जिलों के दंडाधिकारियों से, जिनमें पहले बच्चों को बलि चढ़ाने की प्रथा रही है, इस प्रथा को रोकने के लिए सतर्क रहने की अपेक्षा की जाती है और यह आशा की जाती है कि वे समय-समय पर उन स्थानों पर तथा मौसम में जहाँ और जब ऐसी बलि अब से पहले होती है, इस विनियम के प्रावधानों की घोषणा करवाएँगे।

सामाजिक विधान का दूसरा अंश 1829 का बंगाल विनियम 17 है, जो सती के बारे में है। यह निम्नलिखित रूप में अधिनियमित हुआ हैµ

विनियम XVII

1829 ई.

  1. सती अथवा हिंदुओं की विधवाओं को जिंदा जलाने या दफनाने की प्रथा को अवैध और दंड न्यायालयों द्वारा दंडनीय घोषित करने के बारे में विनियम जो परिषद के गवर्नर जनरल द्वारा 4 दिसंबर, 1829 को पारित किया गया।

प्रस्तावना

I. सती प्रथा या हिन्दुओं की विधवाओं को जिंदा जलाया जाना या दफनाया जाना मानव स्वभाव की संवेदनाओं के प्रतिकूल है। हिन्दू धर्म में कहीं भी यह नहीं कहा गया कि ऐसा करना जरूरी है। इसके विपरीत एक विधवा के मन में मुख्यतः यह बात बिठाई जाती है कि वह शुचिता और एकान्त का जीवन व्यतीत करे। और भारत के अधिकांश