अछूत और ब्रिटिश सरकार - Page 124

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गये व्यक्तियों की जमानत मंजूर की जाये या नहीं, इस बात का फैसला दंडाधिकारी या संयुक्त दंडाधिकारी स्वविवेक से जमानत देने के सम्बन्ध में लागू सामान्य नियमों के अनुसार करेंगे।

निजामत अदालत की कोर्ट को कुछ मामलों में मौत की सजा का आदेश देने से रोका नहीं जाएगा।

V. यह घोषणा करना भी आवश्यक समझा जाता है कि इस विनियम की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह निजामत अदालत की कोर्ट को हिंसा या बल का प्रयोग करने, मद अवस्था या जड़ता या अन्य हेतुक से आक्रान्त होने पर एक हिन्दू विधवा को जलाने या जिन्दा दफनाने में सहायता करने के लिए दोषी ठहराए गये व्यक्तियों को मृत्यु दंड देने से इंकार करती है और कैदी के विरुद्ध साबित हुए अपराध के गुरुतर स्वरूप को ध्यान में रखते हुए कोर्ट उसे दया का समुचित पात्र समझती है। सामाजिक विधान का तीसरा अंश 1850 का जाति निर्योग्यता निवारण अधिनियम 21 है। इस अनिनियम का पाठ इस प्रकार हैµ

जाति निर्योग्यता निवारण अधिनियम, 1850

(1850 का 21)

बंगाल संहिता के विनियम VII, 1832 की धारा 9 के सिद्धान्त का ईस्ट इंडया कम्पनी की सरकार के अधीन राज्यक्षेत्रों में विस्तार करने के लिए अधिनियम

प्रस्तावना

बंगाल संहिता के विनियम VII, 1832 की धारा 9 द्वारा यह अधिनियमित है कि जब कभी किसी सिविल वाद में उस वाद के पक्षकार विभिन्न मतावलंबी हों, जब एक पक्षकार हिन्दू और दूसरा मुसलमान मत का हो, अथवा जहाँ वाद के पक्षकारों में से एक या अधिक या तो मुसलमान या हिन्दू मत के न हों, वहाँ उन धर्मों की विधियों को इस प्रकार प्रवर्तित नहीं होने दिया जाएगा, जिससे वे ऐसे पक्षकार या पक्षकारों को किसी सम्पत्ति से वंचित करें, जिससे कि वे ऐसी विधियों के प्रवर्तन के अभाव में हकदार होते। और उस अधिनियमिति के सिद्धान्त का ईस्ट इंडिया कम्पनी की सरकार को अपने अधीन राज्य क्षेत्रों में विस्तार करना फायदेमंद होगा, अतः निम्नलिखित रूप में इसे अधि नियमित किया जाता हैµ

विधि या प्रथा का, जो धर्म परिवर्तन या जाति च्युति पर अधिकारों को समपहृत या प्रभावित करती है, प्रवर्तन में न रहना।

  1. ईस्ट इंडिया कम्पनी की सरकार के अधीन राज्यक्षेत्रों में अब प्रवृत्त किसी विधि या प्रथा का वह अंश जो किसी व्यक्ति के द्वारा किसी धर्म का त्याग करने या उसे