अछूत और ब्रिटिश सरकार - Page 125

110 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

उसकी सहधर्मचारिता से अपवर्जित किये जाने अथवा जाति से वंचित किये जाने के कारण, अधिकारों या सम्पत्ति का समपहरण करता है या विरासत के किसी अधिकार या किसी प्रकार हृस या उसे प्रभावित करने वाला ठहराया जाये, ईस्ट इंडिया कम्पनी के न्यायालयों में और उक्त राज्य-क्षेत्रों में रायल चार्टर द्वारा स्थापित न्यायालयों में विधि के रूप में प्रवर्तित नहीं किया जा सकेगा।

सामाजिक विधान का चौथा अंश 1856 का हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम XV है। इस अधिनियम का पाठ इस प्रकार हैµ

हिन्दू विधवाओं के विवाह से सम्बन्धित सभी विधिक बाधाएँ दूर करने के लिए विधेयक

प्रस्तावना

जबकि, यह सब जानते हैं कि ईस्ट इंडिया कम्पनी की सरकार के कब्जे में तथा उसके अधीन राज्यक्षेत्रों में स्थापित सिविल न्यायालयों में यथा प्रशासित विधि द्वारा यह माना जाता है कि हिन्दू विधवाएँ कतिपय अपवादों को छोड़कर एक बार विवाह हो जाने के बाद दूसरा विधिमान्य विवाह करने में असमर्थ हैं, और ऐसी विधवाओं की दूसरे विवाह से उत्पन्न सन्तान अधर्मज तथा विरासत में सम्पत्ति प्राप्त करने में असमर्थ मानी जाती है, और जबकि बहुत से हिन्दू यह विश्वास करते हैं कि अध्यारोपित विधिक असमर्थता, यद्यपि प्रचलित रूढि़ के अनुसार है, तथापि उनके धर्म के सिद्धान्तों के सही निर्वचन के अनुरूप नहीं है और वे चाहते हैं कि न्यायालयों द्वारा प्रशासित सिविल विधि इस विचारधारा के हिन्दुओं को अपने अन्तःकरण के आदेशों के अनुसार अन्य रूढि़ अपनाने से न रोके, और जबकि ऐसे सभी हिन्दुओं को इस असमर्थता से, जिसके बारे में वे शिकायत करते हैं, मुक्त करना न्यायोचित है और हिन्दू विधवाओं के विवाह से सम्बन्धित सभी विधिक बाधाओं को दूर करने से, अच्छे नैतिक आधार और लोक कल्याण की अभिवृद्धि होगी, अतः निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता हैµ

हिन्दू विधवाओं के विवाह को वैध किया जाना

  1. किसी रूढि़ और हिन्दू विधि के निर्वहन में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, हिन्दुओं में किया गया कोई विवाह अमान्य और ऐसे विवाह से उत्पन्न सन्तान अधर्मज इस कारण नहीं होगी कि ऐसे विवाह से पूर्व उस स्त्री का विवाह किसी अन्य व्यक्ति के साथ हुआ था या उसकी सगाई किसी ऐसे अन्य व्यक्ति के साथ हो चुकी थी, जो ऐसे विवाह के पूर्व मर चुका था।

विधवा के पुनर्विवाह कर लेने पर मृत पति की सम्पत्ति में उसके अधिकारों का समाप्त हो जाना

  1. ऐसे सब अधिकार तथा हित, जो किसी विधवा को उसके मृत पति की सम्पत्ति