अछूत और ब्रिटिश सरकार - Page 126

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में भरणपोषण के तौर पर या उसके पति की विरासत या उसके पारम्परिक उत्तराधि कारियों की विरासत के रूप में या किसी ऐसी वसीयती व्यवस्था के आधार पर, जो उसे पुनर्विवाह की अभिव्यक्त अनुज्ञा तथा ऐसी सम्पत्ति में उसे अन्य संक्रामण की शक्ति दिए बिना सीमित हित प्रदान करता हो, उसके पुनर्विवाह पर इस प्रकार समाप्त और पर्यवसित हो जाएँगे मानो उसकी उस समय मृत्यु हो गयी हो और तब उसके मृत पति के निकटतम वारिस या उस विधवा की मृत्यु के पश्चात् सम्पत्ति के हकदार अन्य व्यक्ति उसके उत्तराधिकारी होंगे।

सामाजिक विधान के पाँचवे अंश में एक स्त्री के साथ संभोग की आयु सीमा विहित की गयी। यह 1860 का पैंतालीसवाँ ( XLV ) अधिनियम है। (दंड संहिता) इसे धारा 375 में निम्नलिखित रूप में अधिनियमित किया गयाµ

एक व्यक्ति द्वारा बलात्कार किया कहा जाता है, यदि वह इसके पश्चात् अपवादित मामले के सिवाय निम्नलिखित पाँच में से किसी के अन्तर्गत आने वाली परिस्थितियों में एक स्त्री के साथ संभोग करता हैµ प्रथम - उसकी इच्छा के विरुद्ध। द्वितीय - उसकी सहमति के बिना। तृतीय - उसकी सहमति से जब पुरुष मानता है कि वह उसका पति नहीं है और वह सहमति देती है क्योंकि उसका विश्वास है कि वह अन्य पुरुष है जिससे उसका विधिपूर्वक विवाह हुआ है या होने का विश्वास करती है। चतुर्थ - (खाली छोड़ा गया) पंचम - उसकी सहमति या सहमति के बिना जब उसकी आयु दस वर्ष से कम है।

स्पष्टीकरण - (खाली छोड़ा गया) अपवाद - दस वर्ष से कम आयु न होने पर भी अपनी पत्नी के साथ एक पुरुष द्वारा संभोग।

अछूतों के बारे में जानकारी

भारत में जाति और छुआछूत दो बड़ी सामाजिक बुराइयाँ हैं। जाति ने सम्पूर्ण हिन्दू समाज को पंगु बना दिया है। छुआछूत ने समाज के एक बड़े वर्ग का दमन किया है। फिर भी अंग्रेजी सरकार ने इन दो बुराइयों की ओर ध्यान नहीं दिया है। भारतीय दंड संहिता में जाति अथवा छुआछूत के बारे में कोई प्रावधान नहीं है। यह सत्य है कि जाति और छुआछूत सामाजिक मामले हैं। जब लोग एक साथ बैठकर खाना खाने लगेंगे और अन्तर्विवाह करने लगेंगे तो ये स्वतः लुप्त हो जाएँगे। कानून किसी व्यक्ति को दूसरे के साथ खाने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। यह भी सही है कि कानून किसी दूसरे के साथ विवाह करने को भी मजबूर नहीं कर सकता। लेकिन यह भी सच है कि यदि कोई जाति अपनी जाति के किसी आदमी को दूसरी जाति के व्यक्ति से विवाह करने से रोकती है, तो कानून उसे ऐसा करने से मना कर सकता है। जाति चलती रहती है क्योंकि यदि उसका कोई सदस्य जाति के नियमों को तोड़ता है तो जाति उसके विरुद्ध सामाजिक बहिष्कार की घोषणा कर उसे दंडित करने का षडयन्त्र कर सकती है। एक