112 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
कानून बनाकर ऐसे सामाजिक बहिष्कार को एक अपराध घोषित किया जा सकता था। जहाँ तक छुआछूत का सम्बन्ध है, इस मामले में निर्योग्यताएँ मात्र सामाजिक नहीं है। वे मूलतः नागरिक हैं। विद्यालय में दाखिला न ले पाना, सार्वजनिक कूप से पानी न ले सकना, सार्वजनिक वाहन में यात्रा न कर सकना, सरकारी सेवा में प्रवेश न पा सकना, ये सभी निर्योग्यताएँ हैं। ब्रिटिश सरकार का यह दायित्व था कि वह उनके नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक विधान बनाती। यह सम्भव था। जाति निर्योग्यता उन्मूलन अधिनियम जैसा एक छोटा-सा कानून पर्याप्त था। फिर भी ब्रिटिश सरकार ऐसे चलती रही जैसे ये दो बुराइयाँ हों ही नहीं। वास्तव में यह एक बहुत ही असाधारण बात है कि यद्यपि विधायी संस्थाओं की भारत में 1861 में स्थापना हो गयी थी और सार्वजनिक प्रश्नों पर चर्चा की गयी फिर भी दो अवसरों के अतिरिक्त किसी अवसर पर अछूतों का जिक्र नहीं किया गया। पहली बार उनका 1916 में उल्लेख किया गया जब्एक पारसी सज्जन पर मानकैजी दादा भाई ने केन्द्रीय विधानमंडल में निम्नलिखित प्रस्ताव प्रस्तुत कियाµ फ्यह सभा परिषद के गवर्नर जनरल से सिफारिश करती हैं कि वह दलित वर्गों के नाम से जाने वाले लोगों की नैतिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति को सुधारने के लिए, आवश्यक हो तो सरकारी और गैर-सरकारी प्रतिनिधियों की एक छोटी समिति की सहायता से उपाय किये जाएँ और एक प्रारम्भिक कदम के रूप में स्थानीय सरकार और प्रशासनों को स्थानीय स्थितियों का पूरा ध्यान रखते हुए योजनाएँ बनाने के लिए आमन्त्रित किया जाय।य्
इस प्रस्ताव में किसी ने दिलचस्पी नहीं ली। विधान मंडल के हिन्दू सदस्य विधान मंडल के समक्ष ऐसा विषय लाए जाने के कारण प्रस्तावकर्ता से नाराज थे। पंडित मदनमोहन मालवीय ने कहाµ फ्श्रीमान जी, यह कहना अभद्र प्रतीत होता है, लेकिन इस सभा की कार्यवाही की मर्यादा की भावना, मुझे जिस ढंग से इस सभा के साथ विचारार्थ कभी-कभी विषय लाये जाते हैं, उसका विरोध करने के लिए बाध्य करती है। मैं एकदम कह सकता हूँ कि मैं इस प्रस्ताव के उद्देश्य का पूरा समर्थन करता हूँ, लेकिन इसे पेश करने में मेरे मित्र माननीय श्री दादाभाई ने असामान्य तरीके से हिन्दू समाज के विरुद्ध ऐसी टिप्पणी की है जो मैं समझता हूँ कि नहीं की जानी चाहिए थी। ........ मैं हिन्दू समाज में व्याप्त सभी चीजों का बचाव करने के लिए यहाँ नहीं आया हूँ। ........ मैं जानता हूँ कि हमारे समुदाय के एक वर्ग में या दूसरे वर्ग में अनेक पूर्वग्रह या अन्धविश्वास व्याप्त है। यह दुख की बात है लेकिन मैं उसके लिए क्षमायाचना करने के लिए यहाँ नहीं आया हूँ। परन्तु केवल हिन्दू समाज ही ऐसा नहीं है जिन्हें पूर्वग्रहों से मुक्ति पाने में कठिनाई हो रही है। मेरी मंशा किसी का निरादर करना नहीं है, लेकिन मैं एक मृत पत्नी की बहन के साथ विवाह विधेयक के मामले का उदाहरण देना चाहता हूँ। हम हिन्दुओं में ........ के विरुद्ध संघर्ष करने में बहुत बुरे पूर्वग्रह हैं........ लेकिन मैं