अछूत और ब्रिटिश सरकार - Page 128

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नहीं समझता कि इस सभा का कोई सदस्य हिन्दुओं में व्याप्त सामाजिक और धार्मिक निर्योग्यताओं के बारे में यहाँ मौजूद हिन्दुओं को या बाहर यह भाषण देने का अधिकार है। हिन्दू स्वयं उनके विरुद्ध संघर्ष कर सकते हैं और उन्हें दूर कर सकते हैं। जैसा कि पहले बताया जा चुका है, सरकार ने एक विवेकपूर्ण और उदार नीति के अनुसरण में निर्धारित किया है कि वह धार्मिक या सामाजिक-धार्मिक स्वरूप के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगी और इसलिए जिस प्रकार के आरोप यहाँ लगाए गये हैं वे नहीं लगाए जाने चाहिए ......। मैं, जो लांछन लगाए गए हैं, उनके गुण-अवगुण के विवाद में या जो सामान्य टिप्पणियाँ की गयी हैं उनके औचित्य में नहीं जाना चाहता हूँ। और फिर भी यदि मैं ऐसा नहीं करता तो मेरी यह स्थिति रह जाती है कि मैंने यह सुनने पर भी कोई टिप्पणी नहीं की कि देश के एक कोने से दूसरे कोने तक हिन्दू समाज उस सबका दोषी है जो मेरे मित्र इस प्रस्ताव के प्रस्तुतकर्ता ने बताया है ... मैं जानता हूँ कि हिन्दू समाज में कई पूर्वग्रह हैं जिनके विरुद्ध हमें संघर्ष करना होगा और उन पर जीत हासिल करना होगा। लेकिन उन सब के बारे में बताने के लिए यह स्थान उपयुक्त नहीं है।य्

इस बारे में श्री सुरेन्द्रनाथ बनर्जी जैसे समाज सुधारक भी प्रसन्न नहीं थे। उन्होंने कहाµ फ्मुझे बड़ा अफसोस है कि मेरे आदरणीय मित्र, इस प्रस्ताव के प्रस्तावक ने कुछ अवांछनीय ढंग से, मैं नहीं समझता कि उन्होंने जानबूझकर ऐसा किया है, हिन्दू समाज पर प्रहार किया है। उन्हें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हमें पुरानी परम्पराएँ विरासत में मिली हैं जो प्राचीन सभ्यता की देन हैं। इसमें सन्देह नहीं कि उस सभ्यता में दोष थे, लेकिन आदिकाल में यह सभ्यता कानून और व्यवस्था तथा सामाजिक स्थायित्व की एक गारंटी थी। विगत में इससे लाखों लोगों को सान्त्वना मिलती थी। हम अपने पर्यावरण के अनुरूप एक राष्ट्रीय प्रणाली विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन हम उन सभी चीजों को तिलांजलि नहीं दे सकते जो हमें पूर्वजों से मिली हैं। हम उस ढाँचे का आदर करते हैं जो हमारे पूर्वजों ने खड़ा किया है। हमें उनकी त्रुटियों की जानकारी है और हम धीरे-धीरे उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। हम उनसे छुटकारा पाने के लिए कोई क्रान्तिकारी आन्दोलन नहीं छेड़ना चाहते, अपितु धीरे-धीरे परिवर्तन लाना चाहते हैं। मेरे मित्र को हमारे साथ थोड़ी हमदर्दी होनी चाहिए। इन समस्याओं से निपटने के हमारे प्रयासों के प्रति उन्हें उदार रवैया अपनाना चाहिए। मेरे माननीय मित्र ने सुझाव दिया है कि सरकार को उपाय करने चाहिए ... हम इस प्रकार के मामले में सरकार की कार्यवाही का स्वागत करते हैं। लेकिन अन्ततः आप स्थिति का विश्लेषण करें तो आपको पता चलेगा कि यह एक सामाजिक समस्या है और मैं समझता हूँ कि ब्रिटिश सरकार का अपनी प्राचीन परम्पराओं के अनुसार सामाजिक प्रश्नों में हस्तक्षेप न करना ही उचित है। सरकार शिक्षा के माध्यम से बहुत कुछ कर सकती है, उपाश्रित वर्गों में औद्योगिक आन्दोलन के प्रसार से सहायता देकर बहुत कुछ कर सकती है, लेकिन सबसे बड़ी समस्या सामाजिक उद्धार की समस्या है और इस मामले में सरकार केवल एक