अछूत और ब्रिटिश सरकार - Page 129

114 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

शुभचिन्तक दर्शक की भूमिका निभा सकती है या हमारे प्रयासों के प्रति सहानुभूति व्यक्त कर सकती हैं, लेकिन उनमें सक्रिय भाग नहीं ले सकती।य्

माननीय दादाभाई को अपना बचाव करना था। उन्होंने अपने उत्तर में कहा, फ्श्रीमान जी, मैं अपने आपको एक अजीब व दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में पाता हूँ। इस सभा में दो पार्टियाँ हैं और इस अवसर पर वे दोनों बचाव कर रही हैं। इस प्रस्ताव के लाने के लिए किसी औचित्य की आवश्यकता है, तो वह औचित्य इस बात से स्पष्ट हो जाएगा कि मुझे मेरे गैर-सरकारी सहयोगियों से उत्साहरहित और बेमन का समर्थन मिला है। महोदय, मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि यह प्रस्ताव लाने पर मुझे खुशी हुई है। मुझे यह प्रस्ताव लाना पड़ता तो मुझे बड़ी खुशी होती और मैं स्वेच्छा से ऐसा करता, जैसा कि माननीय सदस्य जानते ही हैं। इस पुनर्गठित सभा का यह छठा वर्ष है और दूसरी अवधि अब समाप्त होने वाली है। मैं इस सभा में पिछले पाँच वर्षों से हूँ और इस अवधि के दौरान मैं यह उम्मीद करता रहा कि लोग स्वतन्त्र जन भावना, लोक उद्यम तथा संस्कृति के हिमायती मेरे मित्र माननीय सुरेन्द्र नाथ बनर्जी अथवा पंडित मदन मोहन मालवीय जैसे लोग इस आशय का प्रस्ताव पेश करने का कष्ट करेंगे। मैंने इतना समय इसलिए प्रतीक्षा की, कि इन उत्साही सदस्यों में से कोई न कोई सदस्य दलित वर्गों के उद्धार के लिए प्रस्ताव लाएगा, लेकिन जब मैंने देखा कि इनमें से किसी सदस्य ने यह मामला नहीं उठाया है। यद्यपि कांग्रेस मंच पर भी कतिपय ढंग से इस मामले पर कभी-कभी बहस होती है, तो भी मैंने एक पारसी तथा एक हिन्दू निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधि होने के नाते इस सभा में सार्वजनिक चर्चा के लिए यह मामला उठाना अपना अधिकार समझा।य्

इस झगड़े से सरकार को स्वाभाविक रूप से राहत महसूस हुई। अपनी कर्तव्यच्युति पर परदा डालने में विधानमंडल के हिन्दू सदस्यों का नैतिक समर्थन प्राप्त होने पर सरकार की ओर से बोलते हुए सर रेजीनाल्ड ने निम्नलिखित शब्दों में प्रस्ताव को निपटा दियाµ फ्महोदय, हमें श्री दादाभाई के प्रस्ताव के उद्देश्य से सहानुभूति है। हम स्थानीय सरकारों से इस बात का रिकॉर्ड रखने के लिए कहने को तैयार हैं कि इन लोगों की स्थिति को सुधारने के लिए उन्होंने अभी तक क्या किया है? क्या कर रहे हैं और आगे क्या कर सकते हैं? लेकिन विशेष समितियों में हमें कोई आस्था नहीं है। क्या मैंने सभा को यह नहीं बताया कि समस्याएँ कितनी गम्भीर हैं और समितियों के माध्यम से उनका समाधान करना कितना कठिन होगा? इन समस्याओं की ओर पूरी सरकार ध्यान दे रही है। मैं यह कहना चाहता हूँ कि माननीय दादाभाई जिन उद्देश्य से यह प्रस्ताव लाये हैं उनसे हमें सहानुभूति है, लेकिन हम स्थानीय सरकारों को यह प्रश्न सौंपने का वचन देने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते। हम स्थानीय सरकारों से पूछ सकते हैं कि वे जितना कर रही हैं क्या उससे अधिक भी कर सकती हैं। हम इतना ही कर सकते हैं और इस आश्वासन के साथ मैं माननीय सदस्य से अनुरोध करता हूँ कि वह अपना प्रस्ताव वापस ले लें।य्