अछूत और ब्रिटिश सरकार - Page 130

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दूसरी बार, विधानमंडल की कार्यवाही में अछूतों का उल्लेख 1928 में हुआ जब श्री एम.आर. जयाकर ने निम्नलिखित प्रस्ताव पेश कियाµ फ्यह सभा परिषद के गवर्नर जनरल से सिफारिश करती है कि यह अछूतों तथा अन्य उपाश्रित वर्गों की शिक्षा के लिए विशेष सुविधाएँ देने और उनके लिए सभी सार्वजनिक सेवाओं विशेषकर पुलिस के द्वार खोलने के लिए स्थानीय सरकारों को निर्देश जारी करें।य्

इस अवसर पर भी भारत सरकार उतनी ही उत्साहित थी जितनी की यह 1916 में थी। भारत सरकार की ओर से बोलते हुए भी श्री वी.एस. वाजपेयी ने कहाµ फ्स्थानीय सरकारें अपनी जिम्मेदारी समझती हैं। वे जो कुछ कर सकती हैं कर रही हैं। मैं उनकी ओर से यह दावा नहीं कर सकता कि उन्होंने लक्ष्य प्राप्त कर लिया है परन्तु मैं यह दावा करता हूँ कि अब उनमें जागृति आ गयी है, वे अपनी जिम्मेदारी को बड़ी अच्छी तरह समझती हैं और दलित वर्गों की स्थिति सुधारने के लिए बड़ी लगन से प्रयास कर रही हैं। ऐसी स्थिति में निर्देश जारी करके या माँग करके हस्तक्षेप करना उचित नहीं है। यदि सभा चाहती है, तो सरकार इस राष्ट्रीय समस्या पर सभा के विचारों से उनको अवगत करा सकती है।य् कार्यवाही के अधिकारिक कार्यवृत्त के अनुसार इस भाषण के लिए श्री वाजपेयी की जय जयकार भी की गयी।

सामाजिक सुधार के मामले में ब्रिटिश सरकार का मात्र यही रिकॉर्ड है। यह कितना शोचनीय रिकॉर्ड है? विधायी कार्यकलाप के 60 वर्षों में मात्र 6 सामाजिक कानून बनाये गये। आरम्भ से ही इसकी प्रवृत्ति कोई सामाजिक सुधार न करने की रही है। 1860 तक इसने एक जिम्मेदार सरकार का नकाब लगाए रखा। 1860 के पश्चात इसने वह नकाब उतार कर फेंक दिया। सरकार ने कोई उपाय नहीं किया और सुधार प्रक्रिया बन्द हो गयी। 1881 में बाल विवाह पर रोक लगाने के लिए विधान बनाने के पक्ष में एक बड़ा आन्दोलन शुरू किया गया। सामाजिक सुधार लाने का कष्ट करने के बजाय, ब्रिटिश सरकार ने सार्वजनिक रूप से हमेशा के लिए यह घोषणा करने का साहस किया कि इसकी नीति कोई सुधार करना नहीं है। उस वर्ष के एक सरकारी प्रस्ताव में ब्रिटिश सरकार ने यह उद्घोषणा कीµ फ्श्री मालाबारी की टिप्पणी में जिस प्रकार के विषय उठाए गये हैं उनसे निपटने में भारत में ब्रिटिश सरकार ने आमतौर पर कुछ सामान्य सिद्धान्तों का ध्यान रखा है। उदाहरण के तौर पर जब जाति अथवा प्रथा कोई ऐसा व्यवहार करती है जिससे सामान्य आपराधिक विधि भंग होती है तो सरकार कानून लागू करेगी। जब जाति या प्रथा कोई ऐसा नियम बनाती है जो दीवानी न्यायालयों में लागू किया जा सकता है, लेकिन स्पष्ट रूप से नैतिकता अथवा सार्वजनिक नीति के विरुद्ध है, तो सरकार इसे लागू नहीं करेगी। जब जाति या प्रथा कोई ऐसा नियम बनाती है जिसका सम्बन्ध ऐसे मामलों से है, जो सामान्यतया नागरिकों की इच्छा पर छोड़ दिये जाते हैं और जिन्हें लागू करने के लिए दीवानी या फौजदारी न्यायालयों की सहायता की आवश्यकता नहीं होती तो ऐसे मामलों में सरकार का हस्तक्षेप वांछनीय