अछूत और ब्रिटिश सरकार - Page 131

116 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

अथवा उचित नहीं समझा जाता। ऐसे सामान्य सिद्धान्त विशेष मामलों में लागू करने की बात को लेकर निस्सन्देह मतभेद हो सकते हैं, लेकिन एक सहजबुद्धि कसौटी है, जो इस बात पर विचार करने के लिए प्रायः लागू की जा सकती है कि क्या सरकार को विधायी या कार्यपालिका क्षमता में जिस तरह के अब सामाजिक या धार्मिक प्रश्न उठाए जा रहे हैं उनमें हस्तक्षेप करना चाहिए अथवा नहीं? इसकी कसौटी है कि क्या सरकार अपने सामान्य तन्त्र के आधार पर अपने आदेशों को लागू कर सकती है? यदि नहीं, तो सरकार को कोई ऐसा नियम नहीं बनाना चाहिए, जिसको वह सामान्य व्यवहार या प्रक्रिया का उल्लंघन किये बिना लागू नहीं कर सकती। यदि वर्तमान मामले में यह कसौटी लागू की जाये तो स्पष्ट हो जाएगा कि परिषद के महामहिम यह क्यों समझते हैं कि सरकार का दखल देना अवांछनीय है और श्री मालाबारी ने जिन सुधारों की वकालत की है उनका सम्बन्ध कई जातियों के रीति-रिवाजों से है और उनमें बराबर मतभेद है, इसलिए उनमें हस्तक्षेप न किये जाएँ ताकि समय बीतने के साथ-साथ शिक्षा के प्रसार से लोगों का धीरे-धीरे मानसिक और नैतिक विकास होने के साथ-साथ उसमें भी सुधार हो सके।

फ्यह सही है कि भारत में ब्रिटिश सरकार ने अपने कानून बनाकर नैतिकता का एक ऐसा स्तर कायम किया है, जो जाति के आधार पर कायम किये गये स्तर पर आश्रित नहीं है और कुछ भौतिक पहलुओं में उससे भिन्न है। हो सकता है कि पूर्ववर्ती स्तर का स्वदेशी रीति-रिवाजों, व्यवहारों और विचारधाराओं पर हितकारी प्रभाव पड़ा हो। किंतु विधान शिक्षात्मक प्रयोजनों के लिए ही क्यों न बनाया गया हो, एक ओर विधान और दूसरी ओर जाति अथवा रीति-रिवाज के प्रभाव के बीच प्रतिस्पर्धा होने पर पूर्ववर्ती की सफलता की शर्त यह है कि विधानमंडल को अपनी स्वाभाविक सीमाओं के अन्दर रहना चाहिए और उन सीमाओं का अतिक्रमण करके सामाजिक मत का सीधे विरोध नहीं करना चाहिए।य् अतः जहाँ तक समाज सुधार का सम्बन्ध है, उस प्रस्ताव में निर्धारित नीति ही ब्रिटिश सरकार की हमेशा नीति रही है।

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अंग्रेजी सरकार ने अछूतों को कठिन स्थिति में क्यों छोड़ दिया और उनकी कोई चिन्ता या परवाह क्यों नहीं की? इस अनुचित उपेक्षा का स्पष्टीकरण सर रेजीनाल्ड क्रेडाक ने दिया। वर्ष 1916 में साम्राज्यिक विधान सभा में श्री मानेकजी दादाभाई द्वारा पेश किये गये प्रस्ताव पर भारत सरकार की ओर से उत्तर देते हुए अछूतों के बारे में ब्रिटिश सरकार ने जो दृष्टिकोण अपनाया उसके बारे में उन्होंने कहा हैµ फ्अछूतों के बारे में कठिनाई यह नहीं है कि सरकार उन्हें मान्यता नहीं देती है, बल्कि कठिनाई यह है कि जब तक शताब्दियों पुरानी आदतें और पूर्वग्रह दूर नहीं किए जाते, तब तक उनके पड़ोसी अनिवार्य रूप से उन्हें दबाते रहेंगे ... आपको याद होना चाहिए कि इनमें से अधिकांश लोग गाँवों में रहते हैं और प्रायः गाँव की पिछड़ी गलियों में इनके घर होते हैं। इनके पड़ोसी अभी