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संकुचित विचारधारा से प्रभावित हैं। अतः जैसा कि अनेकों वक्ताओं ने बताया है, इस प्रश्न से निबटने की समस्या केवल प्रशासनिक न होकर सामाजिक और धार्मिक अधिक है। मैं स्वयं विद्यालयों के मामलों में आने वाली कई कठिनाइयों के बारे में जानता हूँ। ऐसे बहुत से स्थान हैं जहाँ महार लड़कों को विद्यालय के अन्दर नहीं घुसने दिया जाता है, वे बरामदे में तो आ सकते हैं और अध्यापक का आंशिक रूप से ध्यान आकर्षित कर सकते हैं या उन्हें पूर्णतया निष्कासित किया जा सकता है। लेकिन इस कठिनाई को धीरे-धीरे ही दूर किया जा सकता है। मेरे सामने यह समस्या निरन्तर आती रहती है। मैंने लोगों को समझाने का प्रयास किया है। मैंने उन्हें बताया है कि वे भी आप की तरह करदाता हैं, या तो उन्हें विद्यालय में आने दीजिए या यदि आप अपने पूर्वग्रहों में फँसना ही चाहते हैं तो वे उचित पूर्वग्रह होने चाहिए। जैसा कि आप समझते हैं, यदि आप इन पूर्वग्रहों से प्रभावित होना ही चाहते हैं तो आप को कुछ ऐसा योगदान करना चाहिए कि इन लड़कों के लिए अलग विद्यालय बनाया जा सके। कुछ अच्छे लोग निम्न जातियों के लिए कुएँ बनाने और विद्यालय बनाने हेतु सहायता देने में आगे आये हैं। उन्होंने ऐसी सहायता करके, कठिनाइयाँ दूर की हैं। पर यह ऐसा मामला है जिसमें समय लगेगा और सरकार किसी को बाध्य नहीं कर सकती। वह कई बार इसके निकट भी जाती है, उदाहरण के तौर पर रेल द्वारा यात्रा में या जब याचिकाएँ न्यायालयों में पेश की जाती हैं। लेकिन वह यह सुनिश्चित नहीं कर सकती कि इन लोगों के साथ उनके कार्यालयों में अच्छा व्यवहार किया जाएगा। मैं समझता हूँ प्रायः इनमें से कुछ जातियों के लोग चाहते हुए भी कई बार सेवा में आने से कतराते हैं, क्योंकि उनके पड़ोसी उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करेंगे। यद्यपि माननीय प्रस्तावक ने बम्बई सरकार द्वारा दिये गये वक्तव्य को ‘शानदार नानµप्रासुमस’ बताया है और मैं समझता हूँ कि सरकार इन बदकिस्मत लोगों की हर तरह से सहायता करना चाहती है। फिर भी यह सही है कि इन जातियों और जनजातियों की स्थिति आंशिक रूप से भविष्य में उनके अपने ऊपर निर्भर करती है और आंशिक रूप से उन अधिक कृपापात्र भारतीय समुदायों पर निर्भर करती है जो या तो मानवता का हाथ बढ़ाकर या अपने हृदयों को कठोर करके और अपने मुँह मोड़कर उनको ऊँचा उठाते हैं या उन्हें पतन की ओर ले जाते हैं। अतः महोदय, जहाँ तक इन दलित वर्गों का सम्बन्ध है, मैं समझता हूँ यह उनकी स्थिति का बिल्कुल सही चित्रण है।य्
सन 1928 में केन्द्रीय विधान सभा में श्री जयकर के प्रस्ताव पर पुनः बहस हुई तो भी यही रवैया रहा। तब श्री वाजपेयी ने सरकार की ओर से बोलते हुए कहाµ ...फ्विशेष विद्यालयों की संख्या बढ़ाने से या विशेष सुविधाएँ देने से अछूतों की समस्या का समाधान नहीं होगा ....... इस समस्या का समाधान तभी होगा जब तथाकथित दलित वर्गों के प्रति समाज के सभी वर्गों का झुकाव तेजी से होगा और उनके प्रति चेतना में विस्तार होगा।य्