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कि सरकार के पास शक्ति तो बहुत थी, लेकिन सरकार ने अपनी शक्ति का प्रयोग नहीं किया। क्योंकि कुछ समय तक उसे यह समझ में नहीं आया कि हिन्दुओं की सामाजिक व्यवस्था में कोई दोष है और जब उसकी समझ में आ गया कि हिन्दुओं की सामाजिक व्यवस्था दोषपूर्ण है तो इस पर डर की भावना मँडराने लगी। यह आमतौर पर जाना जाता है कि अंग्रेज आरम्भ में सोचते थे कि उन्हें ईसाई सभ्यता के प्रसार की अनुमति दी तो इसके भयानक और भीषण परिणाम होंगे। लेकिन यह बात इतने लोग नहीं जानते कि अंग्रेज उसी समय देशज पूर्वग्रहों के प्रति आदर प्रदर्शित कर रहे थे। कलकत्ता के एक धर्मप्रचारक ने 1802 की अपनी पत्रिका में निम्नलिखित तथ्यों का उल्लेख किया हैµ
फ्पिछले सप्ताह एक सरकारी शिष्टमंडल एक शोभायात्रा में कालीघाट गया और हिन्दुओं की वहाँ की देवी को इस देश में अंग्रेजों को हाल में मिली सफलता के लिए, कम्पनी की ओर से धन्यवाद के रूप में एक भेंट प्रस्तुत की। उसमें पाँच हजार रुपये देवी के सामने रखे गये। तब कई हजार देशी लोगों ने अंग्रेजों को इस मूर्ति के सामने अपनी भेंट प्रस्तुत करते हुए देखा। हमें इस कार्य पर काफी दुख हुआ है, पर भारत के लोग इस पर काफी आनन्दित हैं।य्
इसका एक और उदाहरण रॉबर्ट लिंडसे ने दिया है, जो वारेन हेस्टिंग्स के समय ईस्ट इंडिया कम्पनी में एक सिविल कर्मचारी के रूप में कार्य करते थे। सिल्हेट में रेजीडेंट के अपने नये कार्यालय में अपनी पहल का ब्योरा देते हुए उन्होंने कहा हैµ फ्मुझे बताया गया कि नये रेजीडेंट के लिए संरक्षक संत शाजल्लोल की समाधि पर श्रद्धा के सुमन का रिवाज है। इस्लाम धर्म के तीर्थ यात्री इस समाधि पर भारत के हर कोने से आते हैं और बाद में पता चला कि समाधि की देखभाल करने वाले धर्मार्थ लोग जरा भी
खतरनाक नहींं हैं। धार्मिक पूर्वग्रहों का विरोध करना मेरा काम नहीं है। अतः जैसे अन्य लोग मेरे से पहले गये थे, मैं भी दर्शनार्थ गया, अपने जूते प्रवेश द्वार पर छोड़े और भेंट के रूप में समाधि पर पाँच सोने की मोहरें रखीं। इस प्रकार पवित्र होने पर मैं अपने निवास स्थान वापस पहुँचा और अपनी प्रजा की श्रद्धांजलि स्वीकार की।य्
ब्रिटिश सरकार का भारतीय पूर्वग्रहों का समर्थन करने में कितना हाथ था और वह इनमें कितनी दिलचस्पी लेती थी यह बात निम्नलिखित संस्मरण से स्पष्ट हो जाती है बिशप कोरी ने 1833 में मद्रास सरकार को प्रस्तुत किया था। इसमें दिये गये उदाहरण इस प्रकार थेµ
फ्प्रथमः अब सरकार के दोनों सिविल और सैनिक ईसाई कर्मचारियों से सम्मान प्रदर्शित करने की दृष्टि से हिन्दुओं और मुसलमानों के धार्मिक त्योहारों में भाग लेने की अपेक्षा की जाती है। दूसराः कुछ मामलों में उनसे भेंट अर्पित करने और मूर्तियों को श्रद्धा सुमन चढ़ाने की अपेक्षा की जाती है। तीसराः अब मन्दिरों की अपवित्र और अपमानजनक सेवाएँ मूल यूरोपियनों के पर्यवेक्षण और नियन्त्रण में चलाई जाती हैं। इस