अछूत और ब्रिटिश सरकार - Page 137

122 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

ऐसी प्रतिज्ञाएँ देना उचित और न्यायसंगत था या नहीं, यह महसूस किया गया कि एक बार देने के पश्चात् उनकी उपेक्षा करना अनुचित है। यह आम धारणा थी। लेकिन कुछ लोग ऐसे थे जो उनका शाब्दिक अर्थ लेते थे और जिनका विचार था कि कोई भेद न किया जाये और कोई प्रतिबन्ध न लगाया जाये। वे इन प्रतिज्ञाओं का भारतीयों के लिए यह अर्थ लगाते थेµ फ्आपने नये के अधीन निर्विघ्न रूप से आनन्द लिया हैय् और उनका कहना थाµ फ्इससे हटना विश्वास भंग होगा।य् विश्वास भंग का डर एक कारण था। खुले विद्रोह का डर दूसरा कारण था।

जहाँ तक भारत में ब्रिटिश सरकार का सम्बन्ध है, विद्रोह का डर बेवजह का डर नहीं था। यह अनुभव पर आधारित एक तथ्य था। 1801 में एक विद्रोह हुआ था जो वेल्लोर विद्रोह के नाम से जाना जाता है। 1857 में दूसरा विद्रोह हुआ था। यह सिपाही विद्रोह के नाम से जाना जाता है। वेल्लोर विद्रोह एक शोला था और सिपाही विद्रोह एक अग्निकांड था। दोनों विद्रोहों के मामलों में कथित कारण हिन्दुओं के धार्मिक रीति-रिवाजों में दखल देना था। पाठ पढ़ाने के लिए दो विद्रोह काफी हैं और इन दो विद्रोहों के पाठ की ब्रिटिश सरकार ने अनदेखी नहीं की। 1801 के वेल्लोर विद्रोह ने ब्रिटिश सरकार को सामाजिक परिवर्तनों के मामले में सचेत कर दिया। 1857 के सिपाही विद्रोह के पश्चात वे हर प्रकार के सामाजिक सुधार का विरोध करने लगे। अंग्रेज कोई जोखिम नहीं लेना चाहते थे और उनके मतानुसार जोखिम बहुत बड़ा था। विद्रोह ने उन्हें इतना आतंकित बना दिया कि वे सोचने लगे कि सामाजिक सुधार हुआ, तो भारत उनके हाथ से जाता रहेगा, और चूँकि वे चाहते थे कि भारत उनके हाथ में रहे, उन्होंने सामाजिक सुधार की किसी परियोजना पर विचार करने से इंकार कर दिया। समाज सुधार के प्रति ब्रिटिश सरकार का रवैया ऐसा होना स्वाभाविक था। कोई सरकार कितनी ही सार्वभौम हो, प्रो. डिक्के ख्1, के अनुसार इसका प्राधिकार दो प्रतिबन्धों के कारण सीमित हो जाता हैµ

सर्वप्रथम यहाँ आन्तरिक सीमा है जो उन लोगों के चरित्र, उद्देश्यों और हितों से उत्पन्न होती है जो सत्ता में हैं। यदि सुलतान इस्लाम को समाप्त नहीं करता, पादरी ईसाई धर्म को पाबन्द नहीं करता, ब्राह्मण जाति की निन्दा नहीं करता या ब्रिटिश संसद नीली आँखों वाले बच्चों की सुरक्षा को गैर-कानूनी बताती है तो यह इसलिए नहीं है कि वे कुछ नहीं कर सकते, बल्कि इसलिए है कि वे ऐसा नहीं करेंगे। इसी प्रकार यदि भारत में कार्यकारिणी ने कुछ ऐसी चीजें नहीं कीं, जिनसे प्रगति में काफी सहायता मिल सकती थी तो इसका कारण यह था कि वह औपनिवेशिक सरकार थी और अपने चरित्र, उद्देश्यों और हितों के कारण भारतीय समाज की सक्रिय शक्तियों से सहानुभूति नहीं कर सकी थी, उसे उनकी दरिद्रता, व्यथा, लालसा और अभिलाषाओं की कोई चिन्ता नहीं थी, उनकी आकांक्षाओं के प्रति उदासीन थी, शिक्षा को बढ़ावा नहीं देती थी, स्वदेशी के विरुद्ध थी और कोई ऐसी

  1. लॉ ऑफ द कांस्टीट्यूशन, 1915, पृष्ठ 74-82