(i) अंग्रेजी संविधन के आधरभूत सिद्धान्त - Page 146

131

अंग्रेजी संविधान के बारे में जिन कानूनविदों ने लिखा है उन सभी ने विधायी सर्वोच्चता के सिद्धान्त को स्वीकार किया है। संसद की शक्तियों तथा अधिकार क्षेत्र के बारे में बोलते हुए, सर एडवड कोक ने यह स्वीकार किया है, कि यह इतनी श्रेष्ठ और विस्तृत है कि इसे किन्हीं उद्देश्यों या व्यक्तियों के लिए, किसी सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। विख्यात टीकाओं के लेखक ब्लैकस्टोन इस बात से सहमत हैं कि फ्संसद को प्रायः सभी प्रकार के लौकिक अथवा अलौकिक, सैनिक, असैनिक, सभ्य, सामुद्रिक या दांडिक विषयों के बारे में कानून बनाने, उनका अनुमोदन करने, विस्तार करने, सीमित करने, रद्द करने, निरस्त करने, पुनः लागू करने और उनकी व्याख्या करने का सार्वभौम और अनियन्त्रित अधिकार है। यह वह स्थान है जिसे वह निरंकुश शक्ति जो सभी सरकारों में कहीं न कहीं होती है, उन राज्य के संविधान द्वारा दी गयी है। सभी प्रविष्टियाँ और शिकायतें, कार्य और उपचार जो सामान्य कानूनों से परे होते हैं, इस असाधारण प्राधिकरण की पहुँच में आते हैं। संसद, राजा के गद्दी पर आरोहण को नियमित कर सकती है जैसा कि हैनरी VIII और विलियम III के शासन में किया गया था। संसद देश के स्थापित धर्म को बदल सकती है जैसा कि हैनरी VIII और उसके तीन बच्चों के शासनकाल में कई मामलों में किया गया। यह सही है कि जो कार्य संसद कर सकती है वह इस पृथ्वी पर कोई शक्ति नहीं कर सकती।य्

फ्राँस के एक वकील डेलोम कोक, ब्लैकस्टोन से सहमत हैं। उनका कहना है कि संसद एक औरत को आदमी बनाने और एक आदमी को औरत बनाने के सिवाय कुछ भी कर सकती है। संसद की यह विधायी सर्वोच्चता जिसे सभी वकीलों ने स्वीकार किया है, ब्रिटिश संसद के इतिहास से लिये गये बहुत से दृष्टांतों का हवाला देकर सिद्ध की जा सकती है। इस बारे में निन्म विवरण पर्याप्त होगा।

संसदीय संप्रभुता और संघ के कानून

(1) स्कॉटलैंड और आयरलैंड के साथ संघ के कानून सुलहनामों के रूप में हैं और इनके कुछ खंड हैं, जिनको उस समय संघों की मूलभूत और आवश्यक शर्तें समझा जाता था और जिनके बारे में ये लोग यह समझते थे कि इंग्लैंड की सरकार इन्हें दूर नहीं कर सकती। स्कॉटलैंड के साथ संघ के कानून में यह प्रावधान था कि स्कॉटलैंड के प्रत्येक प्रोफेसर इंग्लैंड के धर्म को अपने धर्म की तरह कबूल करेगा और उसका समर्थन करेगा। इसे स्कॉटलैंड के साथ संघ की संधि की एक मूलभूत शर्त माना गया था। लेकिन स्कॉटलैंड विश्वविद्यालय अधिनियम, 1853 द्वारा इस प्रावधान को निरस्त कर दिया गया है जिससे स्कॉटलैंड के विश्वविद्यालयों के अधिकांश प्रोफेसरों के लिए धर्म को स्वीकार करना आवश्यक नहीं रहा है। आयरलैंड के साथ संघ के कानून में यह शर्त थी कि अब विधि द्वारा यथा स्थापित इंग्लैंड और आयरलैंड के गिरजाघरों को सम्मिलित करके एक प्रोटेस्टेंट एपीस्कोपल चर्च बनाया जाये और जिसे युनाइटेड चर्च ऑफ इंग्लैंड एंड आयरलैंड कहा