132 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
जाये और उसमें युनाइटेड चर्च के सिद्धान्त पूजा, अनुशासन उसी तरह लागू रहेंगे जिस तरह कि वे इंग्लैंड के चर्च के लिए यथाविधि स्थापित हैं और इंग्लैंड तथा आयरलैंड के स्थापित चर्च के रूप में उक्त युनाइटेड चर्च को बनाए रखना संघ का एक आवश्यक और मूलभूत कर्तव्य समझा जाएगा और रहेगा। इसमें कोई सन्देह नहीं कि शर्त की भाषा से ऐसा प्रतीत होता है कि इसका उद्देश्य संसद की विधायी सर्वोच्चता को सीमित करना था, फिर भी संसद ने 1869 में ‘आयरलैंड चर्च अधिनियम’ बनाकर आयरलैंड के चर्च को राजकीय संरक्षण से वंचित कर दिया और ऐसा कानून बनाने की इसकी विधायी शक्ति को किसी ने चुनौती नहीं दी।
(2) 1707 का सप्तवर्षीय अधिनियम संसद की विधायी सर्वोच्चता का दूसरा उदाहरण है। 1694 के अधिनियम के अन्तर्गत संसद का कार्यकाल तीन वर्ष कर दिया गया था। वर्ष 1716 में नया चुनाव होना था। तब राजा और मंत्रिमंडल दोनों, इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि इस समय जो राजनैतिक परिस्थितियाँ देश में व्याप्त हैं, उनमें नया चुनाव करवाना मंत्रिमंडल तथा राज्य के लिए अनर्थकारी होगा और उस समय के मंत्रिमंडल ने संसद को संसद का कार्यकाल 3 वर्ष से बढ़ाकर सात वर्ष करने के लिए कानून बनाने की सलाह दी। आलोचकों ने हाउस ऑफ कॉमन्स पर विश्वास भंग करने का आरोप लगाया, क्योंकि जनता के प्रतिनिधि तथा हाउस ऑफ लॉर्ड्स के सदस्य भी इस आधार पर विरोध में शामिल हो गये क्योंकि इस अधिनियम से लोग सांसदों के विरुद्ध कोई कार्यवाही करने से वंचित हो गये थे और वे अपना कर्तव्य निभाने में असफल रहे थे। इस अधिनियम की राजनैतिक आलोचना होने पर इसके कानूनी अर्थ की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया। ऐसा अधिनियम उचित था अथवा अनुचित था यह एक बात थी और संसद अपने कार्यकाल सम्बन्धी कानून को बदल सकती थी या नहीं, यह दूसरी बात थी। ध्यान रहे कि जबकि पहले दृष्टिकोण से अधिनियम का विरोध किया गया, दूसरे दृष्टिकोण से इस पर कभी कोई आपत्ति नहीं की गयी। वास्तव में यह मान लिया गया कि संसद को सप्तवर्षीय अधिनियम बनाने की विधायी शक्ति है।
सप्तवर्षीय अधिनियम का एक अन्य पहलू ध्यान देने योग्य है क्योंकि इससे संसद की विधायी सर्वोच्चता का विस्तार स्पष्ट करने में सहायता मिलती है। संसद, अपना कार्यकाल बढ़ाने के लिए कानून बना सकती थी और यदि इस अधिनियम को भावी सांसदों पर लागू किया गया होता तो कोई आपत्ति नहीं की गयी होती। लेकिन सप्तवर्षीय अधिनियम के द्वारा न केवल सभी भावी सांसदों का कार्यकाल बढ़ाया गया अपितु इसके द्वारा उस संसद का कार्यकाल भी बढ़ा दिया गया, जिसने अधिनियम पारित किया। निस्सन्देह यह राजनैतिक शक्ति हड़पने का कानून था, जिसकी न तो परिकल्पना की गयी थी और न ही कानून द्वारा इस संसद को दी गयी थी, जिसने यह कानून पारित किया। फिर भी