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करने वाले एक राजा की मृत्यु होने के पश्चात तुरन्त ही उसका राजतन्त्र बिना किसी अन्तराल के उसके वारिसों को प्राप्त हो जाता है। यह कानून है और जनता का यह नारा राजा की मृत्यु हो गयी है, राजा की आयु लम्बी हो µ इस कानून के अनुरूप राजसी सत्ता सौंपने के लिए राज्याभिषेक समारोह आवश्यक नहीं है। एक राजा का राज्याभिषेक न हुआ हो तो भी वह राजा के रूप में काम कर सकता है, बशर्ते कि वह पिछले राजा का अगला वारिस हो। राज्याभिषेक समारोह का केवल इतना प्रभाव होता है कि नागरिकों को तथा विश्व को यह मालूम हो जाता है कि राजा कौन है।
समय बीत जाने से राजा का मुकदमा चलाने का अधिकार साधारणतया समाप्त नहीं हो जाताµ दूसरे शब्दों में, परिसीमा कानून साधारण व्यक्ति की तरह राजा पर लागू नहीं होता। साधारण व्यक्ति परिसीमा कानून द्वारा निर्धारित अवधि के भीतर मुकदमा चला सकता है। लेकिन राजा पर समय की कोई पाबन्दी नहीं है। यह कहना कि जहाँ तक मुकदमा चलाने का सम्बन्ध है, इस विशेषाधिकार को सीमित कर दिया जाए। अतः परिसीमा कानून के अन्तर्गत राजा पर समय की जो पाबन्दी लागू होती है उसकी परिसीमा अवधि 60 वर्ष है। अतः राजा को मुकदमा चलाने का जो विशेषाधिकार है वह ज्यों का त्यों बना रहता है।
जब राजा के अधिकार और किसी नागरिक के अधिकार में विरोध होता है तो राजा के अधिकार के आगे नागरिकों के अधिकार समाप्त हो जाते हैं।
संविधियों में विशेष रूप से राजा का नाम न लिया गया हो, तो वे राजा के लिए बाध्यकारी नहीं है। ताज के असाधारण अधिकार मुकदमा चलाने के लिए अखंड रहते हैं।
(ख) राजनैतिक विशेषाधिकार
इनको दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है, जो प्राकृतिक तौर पर आते हैंµ वे जो देश की आन्तरिक सरकार से सम्बन्धित हैं और वे जिनका सम्बन्ध विदेशी मामलों से है। जहाँ तक राजा के देश की आन्तरिक सरकार से सम्बन्धित राजनैतिक विशेषाधि कारों का सम्बन्ध है उन पर राज्य कार्यकलाप के तीन भागों µ अर्थात कार्यपालिका, न्यायपालिका तथा विधायिका के सन्दर्भ में विचार किया जाना चाहिए। अंग्रेजी संवैधानिक विधि के अनुसार कार्यपालिका का नियन्त्रण राजा में निहित है। कार्यपालिका का प्रमुख होना उसका विशेषाधिकार है। ऐसी स्थिति में उसे राज्य के मन्त्री तथा अन्य अधिकारी व राजनैतिक तथा स्थाई नियुक्त करने का अधिकार है। उसे उनको बर्खास्त करने का भी विशेषाधिकार है। वह थलसेना, नौसेना और वायु सेना तथा सिविल सेवा का भी अध्यक्ष है। राज्य की सेवा का निर्वहन करने के लिए नियुक्त हर व्यक्ति उसकी नियुक्ति जैसे भी हो, कानून के अनुसार राजा का सेवक है। जहाँ तक राजा के न्यायिक विशेषाधि कार का सम्बन्ध है, राजा कभी न्याय करने के लिए वास्तव में न्यायालय में बैठता था।