(iii) राजसिंहासन - Page 156

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राजस्व सम्बन्धी विशेषाधिकारµ ब्रिटिश सरकार का राजस्व दो वर्गों में आता है। (1) सामान्य राजस्व और (2) असाधारण राजस्व। सामान्य राजस्व को विशेषाधिकार राजस्व कहते हैं जो निम्नलिखित स्रोतों से प्राप्त होता हैµ (1) एक बिशप की धन सम्पत्ति की अभिरक्षा अर्थात बिशप का स्थान खाली होने पर लाभ लेने का राजा का अधिकार, यद्यपि ये लाभ उसके उत्तराधिकार की धरोहर होता है। (2) चर्च के पहले वर्ष के लाभ और दशम लेने के अधिकार। चर्च के पहले वर्ष के लाभ जो पहले पोप को दिये जाते थे बाद में राजा को दिये जाने लगे। दशम, चर्च के वार्षिक लाभ का दसवाँ भाग था जो पहले पोप को दिया जाता था, अब इनका भुगतान रानी एन्ने के गवर्नर को किया जाता है। (3) राजा की भूमि से प्राप्त लाभ। (4) शाही मत्स्यावशेष निधि, चुटपुट, शाही खानों और राजगत सम्पत्ति।

उपरोक्त मदों से राजा को सामान्य राजस्व प्राप्त होता था, जो विशेषाधिकार द्वारा एकत्र किया जाता था और 1715 तक, राजा को दया जाता रहा। 1715 में राजकुल व्यय अधिनियम पारित किया गया। इसके अन्तर्गत राजा और संसद के बीच एक समझौता किया गया, जिसके अन्तर्गत राजा ने अपना विशेषाधिकार राजस्व अपने राज्य को सौंप दिया। तभी से समेकित निधि में भुगतान किया जाता है और संसद इस कार्य के बदले शाही परिवार को अपने भरण-पोषण के लिए निर्धारित राशि देती है। जो समेकित निधि से हर वर्ष ली जाती है और जिसे राजकुल व्यय कहते हैं। राजकुल व्यय कोई स्थाई व्यवस्था नहीं है, अपितु यह सत्ता पर आसीन राजा और संसद के बीच एक स्थाई समझौता है और यह उस राजा के लिए जीवनपर्यन्त चलता है। जब कोई नया राजा उसका स्थान लेता है, तो उसके साथ एक नया समझौता किया जाता है। यह समझौता भी उसके जीवनपर्यन्त चलता है। यदि कोई समझौता नहीं होता है, तो सामान्य राजस्व के सम्बन्ध में राजा को पुनः विशेषाधिकार प्राप्त हो जाता है। राजकुल व्यय व्यवस्था इसे किसी तरह रद्द नहीं करती। इससे केवल राजस्व के विनियोग पर प्रभाव पड़ता है, इससे राजस्व की वसूली पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

(ग) देश के विदेशी सम्बन्धों के सम्बन्ध में राजा के विशेषाधिकार

राजा को दूसरे देशों के राजदूतों का स्वागत करने और उनमें अपने राजदूत भेजने का अधिकार है। यह उसका विशेषाधिकार है। यह अधिकार महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि जिन राजदूतों को राजा द्वारा राजदूत के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है उन्हें दीवानी और फौजदारी मुकदमों से उन्मुक्ति प्राप्त है। इन उन्मुक्तियों पर विस्तार से बाद में विचार किया जाएगा। यहाँ यह बताना पर्याप्त होगा कि वे राजा द्वारा एक व्यक्ति को एक राजदूत के रूप में मान्यता देने पर निर्भर करती है और वह मान्यता राजा का विशेषाधि कार है। राजा को युद्ध तथा शान्ति करने का भी अधिकार है। वह जब कभी उपयुक्त