(iii) राजसिंहासन - Page 158

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के आधुनिक माध्यमों से दूरी दूर हो गयी है। अतः राजा दूर रहकर भी, तेजी से और बिना किसी विलम्ब के अपने राजसी कर्तव्यों का निर्वहन कर सकता है। राजा अपनी शक्तियाँ किसी दूसरे व्यक्ति को भी प्रत्यायोजित कर सकता है जो उसके दूर होने पर उसकी ओर से उनका प्रयोग कर सकता है। जहाँ तक कानून का सम्बन्ध है, राजा के अवयस्क होने से कोई कठिनाई पैदा नहीं होती। कानून के अनुसार राजा कभी नाबालिग नहीं होता और वह अवयस्क होने पर भी कारोबार कर सकता है। अतः एक अवयस्क राजा अपनी सभी शक्तियों का प्रयोग कर सकता है और कानूनी तौर पर अपने सभी कर्तव्यों का निर्वहन कर सकता है। सामान्यतया यदि यह सम्भव हो कि राजा की मृत्यु होने पर उसका वारिस नाबालिग होगा तो, संसद एहतियात के तौर पर विधि द्वारा एक रीजेंट नियुक्त करती है। लेकिन ऐसा विवेक के आधार पर किया जाता है, कानून के अनुसार ऐसा करना आवश्यक नहीं है।

पागलपन से स्थिति गम्भीर हो जाती है। राजा पागल हो तो वह अपनी शक्तियाँ प्रत्यायोजित नहीं कर सकता। संसद कानून बनाकर रीजेंट की नियुक्ति नहीं कर सकती क्योंकि पागल होने के कारण राजा विधेयक पर अपनी स्वीकृति नहीं दे सकता। ऐसे दो उदाहरण हैं, जब अंग्रेज राजा सत्ता में रहते हुए पागल हो गए थे। 1454 में हेनरी VI और 1788 में जॉर्ज III । उस समय जो प्रक्रिया अपनायी गयी वह अशिष्ट थी पर निश्चित रूप से यह समझा जा सकता है कि वह संविधान के कानून के अनुरूप थी जिसके अनुसार संसद के तीनों अंगों की सहमति आवश्यक है। राजा की नैतिक अयोग्यता एक और कठिन स्थिति है। यह मानकर कि लोग उसे नहीं चाहते तो क्या राजा त्यागपत्र दे सकता है? यदि राजा त्यागपत्र नहीं देता, तो क्या उसे पद से हटाया जा सकता है? राजा की पागलपन और नैतिक अयोग्यता का नियमन करने के लिए कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। सरकार के जिम्मेदार रहने के कारण अंग्रेजी संविधान के अन्तर्गत सम्भवतया नैतिक अयोग्यता का प्रश्न नहीं खड़ा होना चाहिए, पर पागलपन का तो होगा ही।

राजा की मृत्यु का प्रभाव

1. संसद पर

मूल नियम यह था कि राजा की मृत्यु होने पर संसद अपने आप भंग हो जाती थी। जिस संविधान और सिद्धान्त के आधार पर ऐसा किया जाता था वह यह था कि संसद सदस्यों को राजा का सलाहकार समझा जाता था जो उन्हें आमन्त्रित करता था। आमन्त्रित करने के कर्तव्य, जो राजा द्वारा किया जाता था और सदस्यों के बीच जो आमन्त्रित किये जाने पर समवेत होते थे, निजी सम्बन्ध समझा जाता था और यह बन्धन राजा की मृत्यु पर टूट जाता था। मृत राजा द्वारा आमन्त्रित सदस्यों को ऐसी स्थिति में नये राजा के सलाहकार नहीं कहा जा सकता था और राजा को नये सलाहकारों को आमन्त्रित