150 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
इस विशेषाधिकार का उद्देश्य बाहरी व्यक्तियों के सभा में आने और वाद-विवाद सुनने पर रोक लगाना नहीं था। वास्तव में वे सभा में आते थे और वाद-विवाद सुनते थे। इस विशेषाधिकार का प्रभाव यह हुआ कि यदि किसी सदस्य के ध्यान में यह आ जाता था कि वे उपस्थित हैं तो अध्यक्ष को उन्हें बाहर जाने का आदेश देना पड़ता था। इसे लागू करने में असुविधा होती थी क्योंकि केवल एक सदस्य द्वारा बाहरी व्यक्तियों की उपस्थिति पर आपत्ति किया जाना उन्हें बाहर जाने का आदेश देने हेतु अध्यक्ष को बाध्य करने के लिए पर्याप्त था। अतः 1875 में सभा के एक प्रस्ताव द्वारा इस नियम को बदल दिया गया और यह प्रावधान किया गया कि यदि किसी सदस्य को बाहरी व्यक्ति दिखाई देता या तकनीकी भाषा में यों कहें कि सदस्य उठ कर अध्यक्ष को यह बताता है कि महोदय मुझे बाहरी व्यक्ति दिखाई दे रहा है तो अध्यक्ष तुरन्त सभा के समक्ष यह प्रश्न रखेगा कि वाद-विवाद की इजाजत दिये बिना अथवा कोई संशोधन किये बिना बाहरी व्यक्तियों को बाहर जाने का आदेश दिया जाये और इस पर सभी की राय लेगा और तदनुसार कार्यवाही करेगा। इस प्रस्ताव से बाहरी व्यक्तियों को निकालने का विशेषाधिकार तो सभा के पास बना रहा, लेकिन इसका प्रयोग सभा के किसी एक व्यक्ति की सनक के अधीन नहीं रहा बल्कि बहुमत की आकांक्षाओं के अधीन हो गया। अतः इस नियम में अध्यक्ष को अपनी ओर से किसी समय बाहरी व्यक्तियों को बाहर जाने का आदेश देने का अधिकार दिया गया है और इसके लिए सभा के किसी सदस्य द्वारा कोई प्रस्ताव लाया जाना आवश्यक नहीं है।
हाउस ऑफ कॉमन्स का दावा है कि उसे वाद-विवाद की गोपनीयता का विशेषाधिकार है और वह अपने वाद-विवादों और अपनी कार्यवाही के प्रकाशन पर रोक लगा सकता है। 1771 में एक घटना हुई जिससे इस विशेषाधिकार पर बहस की गुंजाइश नहीं रही। एक मुद्रक ने जो लंदन शहर में रहता था, हाउस ऑफ कॉमन्स के वाद-विवाद, उनकी अनुमति के बिना छाप दिये। हाउस ऑफ कॉमन्स अपना विशेषाधिकार इस तरह भंग होने पर नाराज हो गया और अध्यक्ष की ओर से मुद्रक को गिरफतार करने के लिए एक सन्देशवाहक भेजा गया। उधर मुद्रक ने अपने मकान में उस पर प्रहार करने के लिए हाउस ऑफ कॉमन्स के सन्देशवाहक को सिपाही के हवाले कर दिया। जो दंडात्मक कार्यवाही हुई उसमें लंदन शहर के महापौर और दो मुख्यपौरों ने, जो पीठ के सदस्य थे, निर्णय दिया कि हाउस ऑफ कॉमन्स द्वारा जारी किया गया गिरफतारी वारंट शहर में लागू नहीं होता क्योंकि शहर में उनका शासन है और हाउस ऑफ कॉमन्स के सन्देशवाहक को गिरफतार कर लिया गया, यद्यपि उन्होंने उसे जमानत पर छोड़ दिया। हाउस ऑफ कॉमन्स ने महापौर और मुख्यपौरों को, जो पीठ के सदस्य थे और उनके क्लर्क को जिसने अपने ग्रन्थ में सन्देशवाहक की जमानत दर्ज की, बुलवाया। उन्होंने पृष्ठ को फाड़कर ग्रन्थ से सन्देशवाहक की जमानत सम्बन्धी प्रविष्टियाँ मिटा दीं और वारंट को चुनौती देने के लिए महापौर और मुख्यपौरों को टावर ऑफ लंदन के हवाले कर दिया। उसके बाद वाद-विवादों की गोपनीयता से