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विशेषादेशों की अवज्ञाः प्रत्येक सत्र के आरम्भ में प्रस्ताव पारित किये जाते हैं, जिनमें घोषणा की जाती है कि सभा उन लोगों के विरुद्ध अत्यन्त कठोर कार्यवाही करेगी जो सभा या उसकी किसी समिति को दिये जाने वाले साक्ष्य के सम्बन्ध में गवाहों से साठगाँठ कर लेते हैं, उपस्थित होने या गवाही देने से लोगों को रोकते हैं या बाधा डालने का प्रयास करते हैं, और जो सभा अथवा उसकी किसी समिति के समक्ष गलत गवाही देते हैं, ऐसे लोग विशेष आदेशों की अवज्ञा के कारण विशेषाधिकार भंग के दोषी होंगे।
संसद के चरित्र अथवा कार्यवाही अथवा सभा की प्रतिष्ठा के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करके विशेषाधिकार भंग के लिए लोगों को ही दोषी ठहराया जा सकता है। यदि संसद सदस्य भी इस नियम का उल्लंघन करते हैं तो उन्हें भी दंड दिया जा सकता है। 1819 में श्री होभूसे ने जो एक संसद सदस्य था, एक गुमनाम पुस्तिका प्रकाशित करके, सभा द्वारा संसदीय सुधारों का विरोध किये जाने की निन्दा की। जब उसने मान लिया कि वह पुस्तिका उसने प्रकाशित की थी तो सभा ने उसे विशेषाधिकार का उल्लंघन करने के लिए दोषी ठहराया। 1838 में एक और मामले में, श्री ओकोमेड, संसद सदस्य, ने एक आम सभा में आरोप लगाया कि निर्वाचन समितियों में अपने न्यायिक कर्तव्यों के निर्वहन के सम्बन्ध में सभा के सदस्यों ने झूठी कसम ली थी।
सभा के सदस्य के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते समय सभा के सदस्यों के साथ छेड़छाड़ः सभा में आते समय या सभा से जाते समय अथवा संसद में उसके व्यवहार के कारण सभा के किसी सदस्य पर आक्षेप करना, उसका अपमान करना या उसे धमकाना अथवा सभा के समक्ष आने वाले किसी प्रस्ताव के पक्ष में अपने विपक्ष में बलात घोषणा करने के लिए सदस्यों को बाध्य करने का प्रयास करना अथवा एक विशेष ढंग से मतदान करने के लिए संसद सदस्यों को घूस देना, सभा के विशेषाधिकार का उल्लंघन है।
भाग- II
व्यक्तिगत सदस्यों के विशेषाधिकार
1. गिरफतारी से छूट µ इस विशेषाधिकार के अन्तर्गत सदस्यों को सत्र के दौरान तथा इसके आरम्भ होने से पूर्व और समाप्त होने के पश्चात 40 दिन तक गिरफतारी से छूट दी गयी है। आरम्भ में यह विशेषाधिकार सदस्यों को ही नहीं, अपितु उनके नौकरों तथा परिवार जनों को भी प्राप्त था। अब यह केवल सदस्यों को ही प्राप्त है।
2. भाषण की स्वतन्त्रता µ विलियम और मैरी की संविधि एस 2 सी 2 में प्रावधान किया गया है कि संसदीय वाद-विवाद और कार्यवाही में भाषण की पूरी स्वतन्त्रता होगी और वे जो कुछ भी कहेंगे उस पर किसी न्यायालय में या संसद से बाहर किसी स्थान पर कोई आपत्ति नहीं की जाएगी अथवा उसे चुनौती नहीं दी जाएगी।