अध्याय-2 : प्रभुता और भारतीय रियासतों की स्वतन्त्रा होने की माँग - Page 174

अध्याय 2

प्रभुता और भारतीय रियासतों की

स्वतन्त्र होने की माँग

15 अगस्त को स्वतन्त्र राष्ट्र बन जाने पर ट्रावनकोर और हैदराबाद द्वारा अपने आप को स्वतन्त्र प्रभुसत्ता सम्पन्न राज्य घोषित करने की घोषणा और दूसरी रियासतों द्वारा उनके उदाहरण का अनुकरण करने के रुझान से एक नयी समस्या खड़ी हो गयी। यह समस्या कठिन थी और इस पर गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता है। यहाँ प्रश्न के दो पहलू हैं। क्या रियासतें अपने आप को स्वतन्त्र राज्य घोषित कर सकती हैं? क्या उन्हें अपने आप को स्वतन्त्र घोषित करना चाहिए?

हम पहले पहलू से आरम्भ करते हैं। रियासतों ने अपने आप स्वतन्त्र घोषित करने के अधिकार का जो दावा किया था, उसका आधार केबिनेट मिशन द्वारा 12 मई, 1946 को जारी किया गया बयान था, जिसमें उनका कहना था कि ब्रिटिश सरकार किसी भी परिस्थिति में एक भारतीय सरकार को प्रभुता न तो हस्तांतरित कर सकती है और न ही करेगी। इसका अर्थ यह हुआ कि रियासतों को राजा के साथ उनके सम्बन्धों से जो अधिकार मिले हैं वे अब और नहीं रहेंगे और रियासतों द्वारा सर्वोपरि सत्ता को समर्पित सभी अधिकार राज्यों को वापस मिल जाएँगे। कैबिनेट मिशन का यह बयान कि राजा, प्रभुता हस्तांतरित नहीं कर सकता, स्पष्टतया राजनैतिक नीति विषयक बयान नहीं है। यह कानून का कथन है। प्रश्न यह है कि क्या यह कानून का सही कथन है और क्या यह रियासतों पर लागू होता है?

केबिनेट मिशन के इस प्रस्ताव में कुछ भी नया नहीं है। यह राजा और भारतीय रियासतों के बीच सम्बन्धों का अध्ययन करने के लिए 1929 में नियुक्त बटलर समिति द्वारा किये गये विचारों की पुनरावृत्ति है।

जैसा कि इस विषय के छात्र जानते हैं, राजाओं ने बटलर समिति के समक्ष जो नीति अपनाई, उसमें उन्होंने दो प्रस्ताव रखे थेµ

  1. प्रभुता राजकुमारों और रियासतों के बीच हुई सन्धियों में अन्तर्विष्ट शर्तों का उल्लंघन नहीं कर सकती, लेकिन उनके द्वारा सीमित की गयी थी।