160 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- कि प्रभुता में शामिल सम्बन्ध, सम्राट और भारतीय राजकुमारों के बीच निजी प्रकार के थे, इसलिए वे सम्राट द्वारा और उन राजकुमारों की अनुमति के बिना भारत सरकार को नहीं सौंपे जा सकते थे।
बटलर समिति ने पहले दो दावों को स्वीकार नहीं किया। समिति ने घोषणा की कि प्रभुता परम सत्ता है और इस पर सन्धियों में अन्तर्विष्ट कोई शर्त लागू नहीं होती। जहाँ तक दूसरे दावों का सम्बन्ध है, यह बड़ी विचित्र बात है कि बटलर समिति ने इसका समर्थन किया। क्या समिति ने ऐसा प्रभुता के बारे में राजकुमारों के दावे को ठुकराने के कारण समिति से असन्तुष्ट राजकुमारों को खुश करने के लिए किया, इसके बारे में अटकलबाजी लगाने का कोई लाभ नहीं है। तथापि, तथ्य यह है कि इससे भारत सरकार के राजनैतिक विभाग और राजकुमारों को काफी सन्तोष हुआ।
यह सिद्धान्त कि प्रभुता भारत सरकार को हस्तांतरित नहीं की जा सकती, एक बहुत ही शरारतपूर्ण सिद्धान्त है और यह सम्बन्धित विषयों की गलत धारणा पर आधारित है। यह सिद्धान्त इतना प्रतिकूल है कि अंग्रेजी विधि के इतिहास के लेखक स्वर्गीय प्रो. होल्ड्सबर्थ को अक्तूबर 1930 के लॉ क्वार्टरली रिव्यू के पृष्ठों में इसका समर्थन करने के लिए काफी पटुता से काम लेना पड़ा। दुर्भाग्यवश संवैधानिक विधि के किसी भारतीय छात्र ने उनके विचारों का खंडन करने का कभी प्रयास नहीं किया, जिसके परिणामस्वरूप उनका सिद्धान्त इस विषय में अन्तिम और निर्णायक सिद्धान्त बना रहा। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि कैबिनेट मिशन ने उन्हें प्रामाणिक माना और ब्रिटिश इंडिया बनाम भारतीय रियासतों के विवाद को सुलझाने में उन पर अमल किया। यह
खेद का विषय है कि कांग्रेस कार्यकारिणी ने जो समझौते के लिए केबिनेट मिशन से बातचीत कर रही थी, प्रभुता के सम्बन्ध में मिशन द्वारा प्रतिपादित प्रस्ताव को चुनौती नहीं दी। लेकिन ऐसी परिस्थिति में नये सिरे से मामले पर विचार करने और अपना निर्णय लेने का भारतीयों का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता और वे अपने निर्णय पर अडिग रह सकते, यदि उनकी पक्की धारणा हो जाती है कि उनके विचार सही हैं, फिर चाहे केबिनेट मिशन ने जो भी कहा हो।
प्रभुता के बारे में केबिनेट मिशन ने जो दृष्टिकोण अपनाया है उसके विरोध में निम्नलिखित बातें कही जा सकती हैंµ
- प्रभुता, राजा के विशेषाधिकार का दूसरा नाम है। यह सही है कि राजा के विशेषाधिकार के रूप में प्रभुता, राजा के पदेन विशेषाधिकार से दो तरह से भिन्न हैµ (क) राजा के पदेन विशेषाधिकार का आधार संविधि विधि न होकर सामान्य विधि होती है जबकि प्रभुता से उद्भूत विशेषाधिकार का आधार सन्धियाँ तथा प्रथाएँ होती हैं। (ख) राजा के सामान्य विधि विशेषाधिकार राजा की डोमनियनों में रहने वाली