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राजा की पूरी प्रजा और उनमें अस्थाई तौर पर रहने वाले विदेशियों पर लागू होती है, जबकि विशेषाधिकार के रूप में प्रभुता केवल भारतीय रियासतों पर लागू होती है। निस्सन्देह, प्रभुता राजा के विशेषाधिकार का एक भिन्न अंग है। बहरहाल तथ्य यह है कि प्रभुता राजा का एक विशेषाधिकार है।
राजा का विशेषाधिकार होने के नाते, प्रभुता का प्रयोग नगरपालिका विधि के उस अंश के अन्तर्गत किया जा सकता है, जिसे संविधान विधि कहते हैं।
संवैधानिक विधि के सिद्धान्त के अनुसार, जबकि राजा को विशेषाधिकार प्राप्त है, राजा अपने विशेषाधिकार का प्रयोग स्वविवेक से नहीं कर सकता, अपितु वह इसका प्रयोग अपने मन्त्रियों के परामर्श से ही कर सकता है। राजा अपने मन्त्रियों के परामर्श के बिना इसका प्रयोग नहीं कर सकता।
ऊपर प्रतिपादित अन्तिम प्रस्ताव को और विस्तार से बताने की आवश्यकता है, क्योंकि यह पूछा जा सकता है कि मन्त्रिमंडल की सलाह से राजा को काम करना होता है। इसका उत्तर यह है कि राजा को सम्बन्धित डोमीनियन के मन्त्रिमंडल की सलाह से काम करना होता है। फलतः अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग करने के मामले में राजा, ब्रिटेन के मन्त्रिमंडल की सलाह से काम करता था। वेस्टमिनिस्टर संविधि के पारित होने के पश्चात जिसके अन्तर्गत कनाडा, आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका और आयरलैंड पृथक डोमीनियन बन गये, राजा द्वारा अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग सम्बन्धित डोमीनियन के मन्त्रिमंडल के परामर्शों से किया जाता है। उसके लिए ऐसा करना आवश्यक है। वह इसके विरुद्ध कार्यवाही नहीं कर सकता। इसका अर्थ यह हुआ कि जब भारत एक डोमीनियन बन जाता है, तो राजा को अपने विशेषाधिकार अर्थात प्रभुता का प्रयोग भारतीय मन्त्रिमंडल की सलाह से करना होगा।
जो लोग इस सिद्धान्त के समर्थक हैं कि प्रभुता, भारत सरकार को हस्तांतरित नहीं की जा सकती, वे मानते हैं कि भारत सरकार अधिनियम, 1833 की धारा 39 के प्रावधानों को भारत सरकार अधिनियम, 1935 में शामिल नहीं किया गया है। उन्हें भारत सरकार अधिनियम, 1915-19 की धारा 33 में रखा गया था, जिसके अनुसार भारत की असैनिक और सैनिक सरकार (ब्रिटिश भारत की असैनिक और सैनिक से भिन्न) परिषद के गवर्नर जनरल में निहित है और उनका तर्क है कि इस निष्कर्ष का यह सबूत है कि प्रभुता किसी भारतीय सरकार को हस्तांतरित नहीं की जा सकती थी।
संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि यह तर्क बचकाना है। भारत सरकार अधिनियम में ऐसा प्रावधान है या नहीं यह एक पृथक मामला है और इससे कुछ सिद्ध नहीं होता। इस
खंड के न होने से यह सिद्ध नहीं होता कि भारत किसी हालत में प्रभुता के प्रयोग के बारे में राजा को सलाह देने के अधिकार का दावा नहीं कर सकता। भारत सरकार अधिनियम