अध्याय-2 : प्रभुता और भारतीय रियासतों की स्वतन्त्रा होने की माँग - Page 177

162 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

में इसके होने का अर्थ यह नहीं है कि 1833 से 1935 के दौरान भारत सरकार को ऐसी शक्ति प्राप्त थी, जब यह खंड अधिनियम में था, क्योंकि उसी खंड में एक परंतुक था जिसके अनुसार राज्य के सचिव द्वारा जारी किये गये सभी आदेशों का परिषद के गवर्नर जनरल को पूरा पालन करना होता था। इसका अर्थ यह हुआ कि 1835 से 1935 के दौरान भी विशेषाधिकार के प्रयोग के मामले में राजा को सलाह देने का अन्तिम अधिकार ब्रिटिश भारत में भारत के लिए नियुक्त राज्य सचिव को था।

1833 से 1935 के बीच भारत के शासन के सम्बन्ध में संसद द्वारा पारित विभिन्न अधिनियमों में स्वीकार की गयी प्रभुता को समाप्त करने के विभिन्न तरीके, प्रभुता के प्रयोग में राजा को सलाह देने के भारत के लोगों के दावे को प्रभावित नहीं करते और न ही कर सकते हैं। साम्राज्य के संवैधानिक कानून के अन्तर्गत जब कोई देश डोमीनियन बनता है, तभी इसे राजा को सलाह देने का अधिकार होता है और यह तथ्य इसके इस दावे के आड़े नहीं आता कि इसके डोमीनियन बनने से पहले इसे दूसरी सलाह दी गयी थी। 1935 के अधिनियम के अनुसार भारत एक ऐसा देश नहीं था, जिसकी सरकार जिम्मेदार हो। लेकिन यदि इसकी सरकार जिम्मेदार थी, तो भारतीय रियासतों के बारे में राजा के विशेषाधिकारों के प्रयोग के बारे में राजा को सलाह देने का दावा नहीं कर सकता था। इसका कारण यह है कि ब्रिटिश साम्राज्य के संवैधानिक कानून के अनुसार जिम्मेदार सरकार और डोमीनियन स्थिति में अन्तर है। जिम्मेदार सरकार हो तो मन्त्रिमंडल का राजा को सलाह देने का अधिकार और राजा को इसे स्वीकार करने का दायित्व देश के आन्तरिक मामलों से उद्भूत विशेषाधिकारों के मामलों तक सीमित है। विदेशी मामलों में राजा को सलाह देने का अधिकार ब्रिटिश मन्त्रिपरिषद को ही था। लेकिन एक डोमीनियन के मामले में राजा के लिए यह आवश्यक है कि वह मन्त्रिमंडल की सलाह, विशेषाधिकार के प्रयोग के सभी मामलों में स्वीकारे चाहे वे आन्तरिक मामले हों या बाह्य मामले हों। इसी कारण बिना ब्रिटिश मन्त्रिमंडल के हस्तक्षेप से एक डोमीनियन किसी दूसरे देश से सन्धि कर सकती है। भारत सरकार को, राजा को अपने प्रभुता के अधिकार प्रयोग में सलाह देने की इजाजत नहीं दी गयी थी। इस तथ्य का अर्थ यह नहीं है कि कोई स्वाभाविक वैधानिक अयोग्यता है, जो भारत सरकार को सलाह देने के अधिकार से वंचित करती हो। वह क्षण जब से भारत उपनिवेश की स्थिति प्राप्त कर लेता है वह अपने आप राजा को प्रभुता के मामले में सलाह देने की योग्यता प्राप्त कर लेता है। जो कुछ ऊपर कहा गया है वह ब्रिटिश साम्राज्य के संक्षिप्त विवरण के अतिरिक्त कुछ नहीं है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि साम्राज्य के एक भाग को जो डोमीनियन का दर्जा प्राप्त कर लेता है, राजा के विशेषाधिकार के प्रयोग में राजा को सलाह देने का अधिकार कैसे प्राप्त हो जाते हैं। एक डोमीनियन बनने पर भारत को इस अधिकार से वंचित रखा जाये, यह