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बात समानता के सिद्धान्त के अनुसार, राजा को विशेषाधिकार के प्रयोग में राजा को सलाह देने का अधिकार भारत को होना चाहिए, उसी तरह जैसे कनाडा, आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका और आयरलैंड को है। प्रोफेसर होल्ड्सवर्थ भिन्न निष्कर्ष पर इसलिए नहीं पहुँचा क्योंकि उपरोक्त सांविधानिक कानून के मूलभूत सिद्धान्तों से कोई अन्तर नहीं है। वास्तव में उन्होंने उन्हें पूर्णरूपेण स्वीकार कर लिया है। वह भिन्न निष्कर्ष पर इसलिए पहुँचे कि उन्होंने बहस के लिए बिल्कुल भिन्न प्रश्न उठाया। होल्ड्सवर्थ ने यह प्रश्न उठाया कि क्या राजा किसी भारत सरकार को प्रभुता दे सकता है या हस्तांतरित कर सकता है? वास्तव में वाद का विषय यह नहीं है। वास्तव में वाद का विषय यह है कि क्या भारतीय डोमीनियन, प्रभुता के प्रयोगों के मामले में राजा को सलाह देने का दावा कर सकता है। दूसरे शब्दों में हमारा इस प्रश्न से कोई सम्बन्ध नहीं है कि क्या प्रभुता हस्तांतरित की जा सकती है। हमारा सम्बन्ध इस नियम से है कि प्रभुता का कैसे प्रयोग किया जा सकता है। मुझे विश्वास है कि यदि प्रो. होल्ड्सवर्थ ने समझ लिया होता कि सही विषय क्या है, तो किसी दूसरे निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता।
अभी तक मैंने केबिनेट मिशन के बयान के एक भाग पर विचार किया है जिसमें उन्होंने कहा है कि राजा भारत सरकार को प्रभुता हस्तांतरित नहीं कर सकता। केबिनेट मिशन के बयान के अन्य भागों पर विचार करना अभी बाकी है, जिनमें उन्होंने कहा है कि राजा भारत सरकार को प्रभुता हस्तांतरित नहीं करेगा। केबिनेट मिशन के अनुसार प्रभुता समाप्त हो जाएगी। यह बहुत चकित करने वाला बयान है। और सांविधानिक कानून के सुस्थापित सिद्धान्त के प्रतिकूल है। इस सिद्धान्त के अनुसार राजा अपने विशेषाधिकारों को त्याग या छोड़ नहीं सकता। यदि राजा प्रभुता को हस्तांतरित नहीं कर सकता, तो वह इसे त्याग भी नहीं सकता। बनाम बेरामजी के मामले में प्रिवी कौंसिल (सर्वोच्च न्यायालय) ने इस सिद्धान्त को वैध माना था, जिसका निर्णय 1840 में हुआ और जिसकी खबर 5 मूर के पी.सी. पृष्ठ 276 में छपी और जिसमें उन्होंने कहा (पृष्ठ 294) कि राजा अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करने का अधिकार किसी को नहीं दे सकता। अतः यह स्पष्ट है कि केबिनेट मिशन का यह बयान कि राजा प्रभुता का प्रयोग नहीं करेगा साम्राज्य पर लागू सांविधानिक कानून के विरुद्ध है। राजा को प्रभुता प्रयोग करते रहना चाहिए। निस्सन्देह यह सही है कि स्पष्ट कानूनी अधिकार के अनुसार अनुमति दिये जाने पर राजा अपने विशेषाधिकार त्याग सकता है। प्रश्न यह है कि क्या ब्रिटिश संसद के लिए यह वैध और उचित होगा कि वह प्रभुता छोड़ने की अनुमति देने के लिए कानून बनाए। मुझे विश्वास है कि इस सम्बन्ध में भारतीय यह तर्क देंगे कि ऐसा करना न तो ब्रिटिश संसद के लिए वैध और न ही उचित होगा। यह वैध इसलिए नहीं होगा कि भारत के डोमीनियन बनने के पश्चात्, प्रभुता को समाप्त करने का कानून भारत की डोमीनियन संसद द्वारा पारित किया जा सकता है और ब्रिटिश संसद को इस