164 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
मामले में कोई भी अधिकार नहीं होगा। इसी प्रकार यह भी अनुचित होगा कि ग्रेट ब्रिटेन की संसद प्रभुता को समाप्त करने के लिए कोई कानून बनाए। इसका कारण यह है कि प्रभुता की मंजूरी अन्ततः सेना दे सकती है। यह सेना भारतीय सेना रही है जिसके लिए ब्रिटिश भारत सदैव भुगतान करता रहा है। ब्रिटिश भारत ने एक शक्तिशाली सेना
खड़ी न की होती और यह सेना वायसराय तथा गवर्नर जनरल के माध्यम से राजा के अधीन नहीं होती तो राजा प्रभुता की शक्ति ग्रहण नहीं कर पाता और इसे बनाए न रख पाता। ये शक्तियाँ भारत के लोगों के लाभ के लिए धरोहर के रूप में राजा को मिली हैं और यदि ब्रिटिश संसद कानून बना कर इस धरोहर को समाप्त करती है, तो यह विश्वासघात होगा। प्रभुता एक सुविधा है जो राजा को राजकुमारों के साथ सन्धि के आधार पर प्राप्त हुई है। अतः स्वतन्त्र भारत प्रभुता की विरासत का दावा करता है तो यह वैध ही होगा।
यह प्रश्न पूछा जा सकता है कि भारत के स्वतन्त्र होने पर क्या होगा। इसका उत्तर यह है कि राजा नहीं रहेगा और इसलिए राजा को सलाह देने का प्रश्न ही नहीं रहेगा। क्या स्वतन्त्र भारत, विरासत में राजा के विशेषाधिकारों का दावा कर सकता है? इसका उत्तर है हाँ। स्वतन्त्र भारत इसका दावा कर सकता है। क्या स्वतन्त्र भारत उत्तराधिकार राज्य होगा? इस प्रश्न के उत्तर के लिए हमें राज्यों के उत्तराधिकार सम्बन्धी अन्तर्राष्ट्रीय कानून के प्रावधानों पर विचार करना होगा। ओपनहेम ने स्वीकार किया है कि एक परवर्त राज्य को पूर्ववर्ती राज्य के कतिपय अधिकार विरासत में मिल सकते हैं। हाल्स के अन्तर्राष्ट्रीय कानून से यह स्पष्ट हो जाता है कि अन्य वस्तुओं के साथ-साथ राजा के सन्धि के अन्तर्गत जो सम्पत्ति और सुविधाएँ प्राप्त होती हैं, वे उत्तराधिकारी राज्य को विरासत में मिल सकती हैं। एक उत्तराधिकारी राज्य होने के नाते भारत कुछ अधिकार उत्तराधिकार में पा सकता है। उस सम्बन्ध में हाल के अन्तर्राष्ट्रीय कानून से निम्नलिखित अंश उद्धृत करना संगत होगा- ‘‘और चूँकि पुराना राज्य निरन्तर बना रहता है अतः एक व्यक्ति के रूप में इसकी जो चीज होती है वह इसने स्पष्ट रूप से नहीं खोई है तो इसके पास बनी रहती है। अतः वह सम्पत्ति और सुविधाएँ जो इस सन्धि के आधार पर मिली हैं और जिसका सेवन वह एक व्यक्ति के रूप में करता है या इसकी प्रजा इसके अंश के रूप में करती है, इसके पास ही रहती हैं। दूसरी ओर खोए राज्यक्षेत्र पर प्राप्त अधिकार राज्यक्षेत्र के सत्तान्तरणों तथा सीमा के सीमांकनों सम्बन्धी सन्धियों के अधीन प्राप्त अधिकार केवल इसके सम्बन्ध में स्वीकार की गयी देनदारियाँ और वह सम्पत्ति जो इसमें हो और इस कारण स्थानीय स्थिति में संस्थाओं की हो, नये राज्य को हस्तांतरित हो जाती हैं।य्
निष्कर्ष यह है कि भारत के आजाद होने पर भारतीय रियासतों की वही स्थिति