4 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
सेना तथा हथियारों के अमानवीय प्रयोग के अतिरिक्त रोमनवासियों को सड़क बनाने व प्रशासन में महारत हासिल थी। रोमनों की ये कलाएँ पूर्णतया स्वाभाविक हैं तथा साम्राज्यवाद की सगामी है। इनके अतिरिक्त रोम का सभ्यता के मामले में बहुत कम योगदान है।
रोमन साम्राज्यवाद में पूर्वी देशों से निरंतर शांतिपूर्वक घुसपैठ हुई। दर्शन शास्त्र,
खगोल विज्ञान, गणित तथा चिकित्सा शास्त्र पूर्व के देशों की देन है। विद्वता रोमनों की व्यावहारिक प्रतिभा से मेल नहीं खाती थी। रोम के राजदरबार में पूर्वी देशों के अनेकों रत्न थे। मिस्र का दावा है कि प्लोमी तथा प्लोटीनस मिस्र के थे। पोरफीरी तथा लेमलीचस सीरिया की संतान थे, जबकि डायोसकोराइड तथा गैलेन एशिया के थे। रोमन सभ्यता में पूर्वी दासों का काफी योगदान रहा। इन्होंने रोमन बच्चों को राज्य द्वारा स्थापित जनता विद्यालयों में शिक्षा भी दी। रोमन सौंदर्य के नहीं अपितु सामर्थ्य के प्रशंसक थे। रोम ने, जो कला-विहीन था, अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए कला और कलाकारों को प्रोत्साहन दिया। रोम के लोगों को शोख रंगों में बड़ा आनंद आता था। यह बात इस तथ्य से स्पष्ट हो जाती है कि ट्रोजन के वृहद खंभों की सजावट सुनहरे तथा सिंदूरी रंगों में की गयी है। इसकी प्रेरणा उन्हें पूर्वी देशों के साथ व्यापार से मिली। ख्1, रोमन वस्तुकला भी पूर्वी देशों के दासों की देन है। रोम की संपूर्ण शक्ति युद्ध जीतने में व्यय होती रही या अपने अस्तित्व की लड़ाई में व्यय होती रही। लेकिन युद्ध के बाद के आराम के समय का उपयोग रोम के अधीनस्थ लोगों द्वारा रोम में लाई गई। विभिन्न प्रतिभाओं से लाभ उठाने के लिए किया गया होगा। दुर्भाग्य से रोम ने कभी यह महसूस नहीं किया, और यदि महसूस किया तो बहुत देर से महसूस किया, कि शांति का भी अपना एक महत्व होता है जो युद्ध के महत्व से किसी तरह कम नहीं है......।ऽ
रोम की विशुद्ध सैनिकवादिता इस बात से बिल्कुल मुखरित हो जाती है तथा यह इस तथ्य से स्पष्ट हो जाती है कि रोम ने शांति की प्रतिमा स्थापित की थी।ऽ
यद्यपि रोम में कुछ उद्योग थे परंतु उनकी उत्पादन क्षमता बहुत कम थी। उनका उपयोग उत्पादन से अधिक था जिससे लगातार मुद्रा बाहर जाती थी। लेटफुंडि़या ने रोम की कृषि नष्ट कर दी थी और किसानों को भिखारी बना दिया था, इस कारण खाद्यानों के लिए सिसली और मिस्र पर आश्रित हो गया था। कुछ हाथों में भूमि के केंद्रित हो जाने के कारण भूमि उत्पादक नहीं रही थी तथा वास्तव में इटली में नाम मात्र की भी उपज नहीं थी। रोम में प्रायः सभी वस्तुएँ पूर्वी देशों से आती थीं और इनके बदले में यहाँ से कोई भी चीश नहीं जाती थी अन्यथा बहुत कम चीशें जाती थीं।
- डब्ल्यू. आर. पेटर्सन, फ्द नेमिसिस ऑफ नेशंस,य् पृष्ठ 307
ऽ यह भाग दीमकों ने खा लिया है।