अध्याय-1 : प्राचीन भारतीय वाणिज्य - Page 22

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प्रकृति के मामले में तो शोचनीय अभाव है। हिंदू अपने जीवन के आर्थिक कार्यों को छोड़कर सभी चीशों में बातूनी हैं और इसका कारण जानना कठिन नहीं है। समाज में एक वर्ग ने शिक्षा पर अधिकार कर लिया जो प्रायः मधुमक्खी के छत्ते में नर मधुमक्खी की तरह थे जो दावत पर एकदम टूटते हैं जिसमें उनका कुछ भी योगदान नहीं है। ब्राह्मण अथवा बुद्धिजीवी आराम की शिन्दगी व्यतीत करते थे और खूब खाते-पीते थे। यही कारण है कि प्राचीन हिन्दुओं की आर्थिक गतिविधियों का किसी ने निरूपण नहीं किया है और साहित्य में उनका कोई उल्लेख नहीं है जो पूर्णतः ब्राह्मणवादी है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि भारत ने आर्थिक विज्ञान पर कोई साहित्य क्यों तैयार नहीं किया। अतः विदेशी लेखकों ने इस बारे में जो थोड़ा बहुत उल्लेख किया है हमें पूर्णतः उस पर निर्भर रहना पड़ता है। यह बेहतर होगा कि हम वाणिज्य के विषय पर आने से पूर्व प्राचीन भारत के आर्थिक विकास का संक्षेप में निरीक्षण करें। इस विषय पर हमें ऐसा कोई साहित्य नहीं मिलता जिससे हमें बौद्धों से पहले के समय के बारे में जानकारी प्राप्त हो सके। बुद्ध जातक अर्थात् बुद्ध के जन्म की कहानियाँ इस विषय का प्राचीनतम स्रोत हैं। इन जातकों में भारतीय समाज के आर्थिक संगठन का हवाला दिया गया है। यह समाज इन जातकों के लिखे जाने से बहुत पहले अस्तित्व में था।

1. कृषि संगठनः

प्राचीन काल में हिंदू गाँवों में रहते थे। उस समय मकान दूर-दूर न होकर एक साथ कई मकान होते थे। हर गाँव में 30 से 1000 परिवार रहते थे। कृषि उच्चतम व्यवसाय समझा जाता था और जैसा कि हर भारतीय मानता है, व्यापारियों को दूसरा स्थान प्राप्त था। सामाजिक श्रेणीक्रम में सिपाही अंतिम स्थान पर था।

खेत को किसान तथा उसके परिवार द्वारा और कभी-कभी किराए के मशदूरों द्वारा जोता जाता था। परंपरागत भावना भूमि स्थानांतरण के विरुद्ध थी। फिर भी हम देखते हैं कि भूमि खेती के लिए लगान पर दी जाती थी। स्वतंत्र रूप से जो भूमि का स्वामी होता था, उसकी इश्शत थी। लेकिन पूँजीपति के खेत पर काम करना पसंद नहीं किया जाता था। इस बात का कोई निश्चित सबूत नहीं है कि ग्रामीण जीवन में शमींदारी प्रथा थी अथवा नहीं।

सड़कों, तालाबों तथा नगरपालिका इमारतों को बनाने तथा उनकी मरम्मत करने में जनता पूरा सहयोग देती थी। फ्राजा कच्चे माल पर वार्षिक तिलहा लेता था। यह माल के रूप में 1/6, 1/8, 1/10 या 1/12 होता था। दालें, अनाज तथा गन्ना मुख्य पैदावार थे। सब्शियों और संभवतः फूलों की भी खेती होती थी। चावल मुख्य

ऽ यह भाग दीमकों ने खा लिया है।

  1. थॉमस. ई. डब्ल्यू. हिस्ट्री ऑफ इंडिया। पृष्ठ-2