अध्याय-1 : प्राचीन भारतीय वाणिज्य - Page 24

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फ्सभी व्यापारिक उद्योग-धंधों में एक अच्छा-खासा संगठन था। कतिपय व्यवसाय

खास गाँवों में स्थापित थे, जो उपनगर थे या बड़े शहरों के साथ लगे थे या आसपास के गाँवों से जुड़े थे जैसे, लकड़ी तथा धातु का सामान बनाने वाले उद्योग और कुम्हारी। जो व्यवसाय शहरों में थे वे विशेष गलियों में थे जैसे हाथी दाँत का सामान बनाने वाले और रंगाई करने वाले।य्

व्यवसाय भली-भाँति संचालित थे तथा एक या दो बड़े कारीगरों द्वारा निरीक्षित होते थे जो नगर पालिकाओं और शहरों के औद्योगिक संगठनों के मुखिया होते थे।

प्रमुखों या वरिष्ठ लोगों (बैठकों) की अध्यक्षता में अनेक शिल्पीसंघ (सेनियो) थे। बढ़इयों, लोहारों, मोचियों, रंगरोगन करने वालों तथा विभिन्न कलाओं के विशेषज्ञों के अपने ग्रिड थे। यहाँ तक कि मल्लाहों, हार बनाने वालों तथा कारवाँ व्यापारियों के भी अपने ग्रिड थे।

वंशानुगत व्यवसाय के शिल्पीसंघ थे, लेकिन कठोर जाति प्रथा नहीं थी और ब्राह्मण भी निकृष्ट पेशे करते थे।

नदियों के रास्ते बहुत कम आना-जाना होता था, यह श्यादातर कारवाँ से होता था। औद्योगिक केंद्र अच्छी सड़कों से जुड़े थे जिससे आने-जाने में काफी सुविधा होती थी। रामायण में उल्लेख है कि एक सड़क राजा दशरथ की राजधानी अयोध्या से आरंभ होती थी और हिमालय पहाड़ के पास व्यास नदी पर स्थित कैकेयी की राजधानी राजगृह तक जाती थी। व्यास नदी जिसका प्राचीन नाम विपाशा है जिसको यूनानी लोग हाईपासिस के नाम से जानते थे, हस्तिनापुर (दिल्ली) कुरू राज्य की राजधानी से होकर जाती थी। प्राचीन भारत की सड़कों के बारे में सिकंदर की सूचना सम्भवतया सर्वाधिक सही है तथा सड़कों का माप करने के लिए नियोजित सर्वेक्षकों का सबसे बड़ा स्रोत है। इस स्रोत से हमें पता चलता है कि एक सड़क पुष्कलावती से, जो आधुनिक अटक के पास है, तक्षशिला होकर व्यास नदी पार करके पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) जाती थी। एक और सड़क पुष्कलावती को इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) से जोड़ती थी और उज्जैन को जोड़ती हुई विंध्य पार करके प्रतिस्थाना होती हुई नर्मदा व ताप्ती को पार करके दक्षिण की ओर जाती थी। यातायात के आंतरिक राजमार्ग भी थे जिसका कारवाँओं के उदय द्वारा संचालन होता था। आरंभ में भारत में आन्तरिक व बाह्य व्यापार का महत्त्व इतना अधिक हो गया था कि बुद्ध जातकों में हमें कारवाँ नेताओं के एक संगठन का उल्लेख मिलता है। पाली में कारवाँ नेता अथवा सार्थवाह यात्रा में अगुवाई करता था और उसका काम यह हिदायत देना होता था कि कहाँ रुकना है, कहाँ पानी पीना है, लुटेरों के प्रति क्या सावधानी बरतनी है, कौन से रास्ते से जाना है, आदि। व्यादियों के कारवाँ अधि कतर रात को यात्रा करते थे।