अध्याय-1 : प्राचीन भारतीय वाणिज्य - Page 25

10 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

प्राचीन भारत में व्यापार पूर्णतः व्यक्तिगत नहीं था। निगमित व्यापार सिद्ध करने के बहुत से सबूत हैं। कभी-कभी व्यापार में हिस्सेदारी भी होती थी, परंतु इसका प्रचलन बहुत कम था। व्यापार पर सरकारी नियन्त्रण नाममात्र का था और यह केवल राजकीय

खरीद से संबंधित था। राजाओं द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं की कीमतें राज्य के मूल्य आँकने वालों द्वारा निश्चित की जाती थीं। वे व्यापारियों पर कर का निर्धारण भी करते थे जिन्हें स्वदेशी माल की प्रत्येक खेप पर संभवतया तदर्थ आधार पर बीसवाँ हिस्सा शुल्क के रूप में देना पड़ता था और विदेशों से आने वाले माल की प्रत्येक खेप पर 10 प्रतिशत शुल्क और एक अदद नमूना देना पड़ता था। अंत में वे यह हिसाब लगाते थे कि एक व्यापारी द्वारा छूट देने पर राजा को प्रति माह बेची गई एक वस्तु पर किसान ‘राजकसया’ बना।

किन्तु बाद में मूल्यों का निर्धारण कर दिया गया। मनु का कहना है कि प्रत्येक 5वें या 9वें दिन राजा द्वारा विपणीय वस्तुओं का मूल्य निर्धारित किया जाता था।

भारत में मुद्रा का प्रचलन, चाहे इसे बाहर से लिया गया हो अथवा देश में खोज निकाला गया हो, विवाद का विषय है, लेकिन इसके बारे में जो कुछ भी कहा जाए, सत्य यह है कि भारत में मुद्रा का चलन प्राचीन काल से था। बौद्ध साहित्य यह प्रमाणित करता है कि वस्तुओं की अदला-बदली की पुरानी प्रथा जिसके अंतर्गत गाय के बदले चावल या कोई अन्य चीज भी ली जा सकती थी, का स्थान धातु मुद्रा ने ले लिया। मुद्रा का एक निश्चित और स्वीकार्य विनिमय मूल्य था। मुद्रा के अंतर्गत सिक्के आते थे, लेकिन इसे सरकार नियन्त्रित नहीं करती थी। अधिकतर सिक्के सोने के थे और फ्विक्रय वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमत नकदी में व्यक्त की जा सकती थी।य् बैंक प्रणाली अधिक विकसित नहीं हुई थी। ऋण देने पर कोई रोक नहीं थी। गौतम के अनुसार सूद छह विभिन्न प्रकार से लिया जाता था। ख्1,

इस प्रकार के उच्च आर्थिक विकास की दृष्टि में प्राचीन हिंदुओं द्वारा उपनिवेशीकरण का व्यापारिक प्रसार किया जाना स्वाभाविक ही था। परंतु इतिहासकार यह तथ्य स्वीकार करने में बहुत संकोच करते हैं। लगता है कि उन्होंने ऐसा वर्तमान कसौटियों को इस आधार पर माना है कि समस्त हिन्दू आबादी अक्षम है अथवा उन्होंने पूर्वाग्रह के कारण ऐसे साक्ष्य की ओर ध्यान नहीं दिया है जो उनकी बनी हुई सोच से मेल नहीं खाता। भारत का एकाकीपन उनके लिए एक तुरूप का पत्ता रहा है और उन्होंने जब चाहा इसका प्रयोग किया। पर्यावरण से लोगों की गतिविधियाँ परिसीमित तो होती हैं, लेकिन हिरडर का यह कहना उचित नहीं है कि ‘इतिहास हरकत में आया भूगोल है।’ हम यह

  1. पूर्व भारत में आर्थिक संगठन की जानकारी 1901 के रॉयल एशियाटिक रिसर्चस् के पृष्ठ 859 से ली गई है। µ केरोलिन फोले रिहयस् डेविडस् एम.ए.