अध्याय-1 : प्राचीन भारतीय वाणिज्य - Page 28

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इस समय संभव नहीं है। यदि परोक्ष रूप से व्यापार होता था तो उनके लिए विपुल धन-धान्य के दरवाजे खुल गये थे और भारत का उत्पादन वास्तव में मिस्र पहुँचता था। थैबैंस के मकबरों से हमें इस बात के ठोस प्रमाण मिलते हैं। जोसेप के उस देश में पहुँचने के समय ही भारतीय माल मिस्र पहुँच गया था, यह बात मसालों से साबित हो जाती है जो इशमैकलाइट वहाँ बेचते थे और नीलमणि, हैकमेटाइल, लापिस, लजुली जैसे रत्न तथा अन्य वस्तुएँ जो तृतीय थॉथमस तथा उत्तरवर्ती बादशाहों के समय में थवस में मिली उनसे स्पष्ट होता है कि वस्तुओं का आदान-प्रदान निरंतर होता रहा था। ख्1,

‘संस्कृति सदैव वाणिज्य का अनुसरण करती है’ वर्तमान की अपेक्षा प्राचीन काल के मामले में यह उक्ति अधिक सही है। पुराने समय में व्यापारियों के कारवाँ अपने साथ माल ही नहीं अपितु संस्कृति भी ले जाते थे। उन्होंने संस्कृति प्रसार किया और इसे विश्वव्यापी बनाया। भारत के साथ वाणिज्यिक संबंधों से मिस्र की वास्तुकला पर इतना प्रभाव पड़ा कि जेम्स फर्गुसन ने ‘हिस्ट्री ऑफ आर्किटैक्चर (पृष्ठ 142-3) में लिखा है कि एक्जम में लगा हुआ पत्थर का महान खंभा भारत की प्रेरणा से बना है, विचार मिस्र का था किंतु कारीगरी भारतीय थी। एक भारतीय नौ मंजिला पैगोडा की मिस्र में ईस्वी सन् की प्रथम सदी में प्रतिमूर्ति बनाई गयी। बोधगया जैसे भारतीय मंदिरों से इसकी समानता इंगित करते हुए वह कहते हैं कि फ्भारतीय कला का मिस्र की कला के साथ विलक्षण प्रणय का यह प्रतीक है।य् उस समय प्रायः ऐसा होता था कि जब दो लोग सम्पर्क में आते थे तो वास्तुकला को अपने व्यापारिक सहयोग का प्रतीक बना लेते थे। ख्2,

यहाँ भारत के आदि निवासी द्रविड़ों का यद्यपि वे आदिम जातियाँ नहीं थे, पश्चिमी एशिया के लोगों के साथ संबंधों का उल्लेख करना भी प्रासंगिक होगा। श्री गुस्टव ओपर्ट का कहना है फ्अब कीलाकार अभिलेखों का अर्थ समझ में आने से निस्संदेह यह सिद्ध हो गया है कि तूरानी साम्राज्यों में संस्कृति काफी विकसित हो गयी थी। यह संस्कृति यद्यपि विचित्र भौतिकता से दूषित हो गयी थी, फिर भी कुछ कलाओं और विज्ञान के क्षेत्र में इसने काफी हद तक पूर्णता प्राप्त की। इन तूरानियों में हमारे समय के भारत के द्रविड़ भी आते हैं जिनका उन दिनों अरियाना तथा फारस पर कब्जा था।

यूरोप में एस्थोनियन्स उन तूरानियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, और पश्चिमी तथा मध्य एशिया के बहुत से स्थानों पर वे वहाँ की जनता का आधार बन गए जबकि चीन में उन्होंने खगोलीय साम्राज्य की सभ्यता की नींव रखी।य् इन तूरानियों ने सम्पूर्ण प्राचीन विश्व में साम्राज्य स्थापित किए। तूरानियों का मूल निवास फ्एरल झीलय् के आसपास का क्षेत्र माना जाता है। वहाँ से वे एशिया के बड़े भूभाग में फैल गए और

  1. गार्डनर विल्किन्सन µ ‘दि एनशेंट एजेपिश्यंस, भाग-1, पृ. 161 और 250

  2. फ्द पेरीप्लस ऑफ द ऐंटीथ्रेकन सीय्, डब्लू.उच. स्कॉफ द्वारा अनुवादित, पृष्ठ 66-67