15
के लोगों को किस तरह व्यापार गुजारा करना पड़ा, राबर्टसन का कहना हैµ फ्वे जो विभिन्न प्रकार का व्यापार करते थे, उनमें भारत के साथ उनका व्यापार काफी श्यादा मात्रा में था तथा बहुत लाभप्रद था।य् भूमध्यसागर में अपनी अवस्थिति तथा जहाजरानी की अधूरी जानकारी होने के कारण, वे समुद्र के रास्ते भारत से सीधा व्यापार करने का प्रयास नहीं कर सकते थे, व्यापार की भावना ने उन्हें इंदुमाकस से पश्चिम की ओर अरब खाड़ी के कुछ बड़े बंदरगाहों की ओर प्रेरित किया। वहाँ से वे एक ओर भारत से और दूसरी ओर अफ्रीका के पूर्वी और दक्षिणी तटों से नियमित व्यापार करते थे। किन्तु अरब खाड़ी और जयरे के बीच काफी दूरी थी और सड़क के रास्ते यहाँ सामान लाना, ले जाना बहुत कठिन था। अतः उनके लिए फिनोकोलूरा बंदरगाह पर कब्जा करना आवश्यक हो गया। वहाँ पर भारत से लाई वस्तुएँ पूरे देश में छोटे और व्यावहारिक रास्ते से ले जाई जाती थीं। बाद में, पूर्व के देशों से आया माल अरब खाड़ी के दूसरे तट से नील नदी ले जाया जाने लगा जो अपेक्षाकृत लम्बा रास्ता था। रिहनोकोलूरा में उन्हें दूसरे छोटे जहाजों में लादा जाता था और टायरे ले जाया जाता था और वहाँ से पूरे विश्व में बाँटा जाता था। यह रास्ता भारत से सम्पर्क का प्राचीनतम मार्ग है जिसके बारे में विश्वसनीय जानकारी है। पूर्व की ओर नए जल मार्ग की आधुनिक खोज से पहले इस रास्ते के अनेक लाभ थे। फोनीसियन्स भारत के माल को दूसरे राष्ट्रों में उस समय के अन्य लोगों की तुलना में अधिक मात्रा में और कम कीमत पर भेज सकते थे। ख्1, श्री रॉबर्टसन के विचारों की पुष्टि करने वाला एक अन्य तथ्य यह है कि फोनीसियन्स ने भारत में अपने दस्तावेज पेश किये जो दोनों के आपसी संबंधों का प्रत्यक्ष प्रमाण है। राजा सोलोमोन ने पड़ोसी फोनीसियन्स से प्रेरित होकर अथवा अन्यथा टायरे के राजा हिराम से हाथ मिलाया और ईलम तथा ईजियोनघेहर में एक समुद्री बेड़ा बनाया। इस बेड़े में फोनीसियन्स नाविक थे जो क्यूफिर जाते थे और बहुत-सा धन लाते थे जिसे दोनों राजा आपस में बाँट लेते थे। कूफिर कहाँ है यह भी अनिश्चित है। लेकिन सभी व्यावहारिक प्रयोजनों के लिए प्रोफेसर लैसेन ने यह कह कर इस विवाद को समाप्त कर दिया है कि भारत के गुजरात प्रांत में अभीरा नामक स्थान ही क्यूफिर है। हर तीन वर्ष बाद यात्रा दोहराई जाती थी तथा कीमती वस्तुओं से लदे जहाज देश में आते थे। फ्इससे देश इतना धनवान हो गया कि राजा ने जैरूसलम में चाँदी को पत्थर समझा और देवदार के वृक्ष को अंजीर का वृक्ष जो दर्रा में बड़ी मात्रा में है।य् ख्2,
इस प्रकार लोगों को जहाँ व्यापार के लाभ हुए वहीं उन्हें इनके खतरों का भी सामना करना पड़ा। फलस्वरूप, डीन स्टैनले के शब्दों में (सैनाई एवं पैलेस्टीन पृष्ठµ261)
डब्ल्यू. राबर्टसन, ‘डिस्क्यूजन’ पृष्ठ 7-8
1 किंग्स X 27