अध्याय-1 : प्राचीन भारतीय वाणिज्य - Page 31

16 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

फ्राजधानी के बारे में यह कहना कि वह एक ऐसा स्थान था जहाँ से कोई लम्बी नाव पतवारों सहित नहीं जा सकती थी और न ही कोई बड़ा जहाज गुजर सकता था, (इसाइयाह XXXIII 21 ), भले ही पश्चिमी धारणाओं के अनुसार कमजोरी तथा खतरे का द्योतक हो, किन्तु वास्तव में यह संपन्नता एवं सुरक्षा की अभिव्यक्ति थी।य्

भारत और जुडेया के बीच व्यापार सोलोमन के समय से आरंभ नहीं हुआ, यह बहुत प्राचीन है। क्यूफिर का वर्णन सोलोमन से काफी पहले प्रथम क्रानिकल्स XXIX 4, 1 किंग्स XXII 48 और इसाइयाह 12 में मिलता है। बाइबिल के इन सबूतों की पृष्टि भाषा के सबूतों से होती है जैसे कि हिब्रू भाषा का शब्द ‘टुकी’ जो काव्य के शब्द फ्टोकेईय् का थोड़ा बदला हुआ रूप है अर्थात मोर के लिए तमिल-मलयालम भाषा या हैब्रू का शब्द ‘अहालिम’ या ‘अहोलोथ’-आलोस- जो तमिल या मलयालम में शब्द ‘अगहिल’ का अपभ्रंश रूप है। ख्1,

बेबीलोनिया का उत्थान भारत के प्राचीन वाणिज्य में एक महत्त्वपूर्ण चरण है। यूफेटस और टिगरी के संगम पर स्थित होने, फारस की खाड़ी को भूमध्यसागर से मिलाने और ऊपरी तथा निचले एशिया का संगम स्थल होने के कारण बेबीलोन का पूर्वी तथा पश्चिमी व्यापार का एक बड़ा बाजार बनना स्वाभाविक था। यह प्राचीन विश्व के सभी भागों से निकलने वाले मार्गों का संगम स्थल था। श्री केनेडी का कहना है कि इस आशय के काफी साक्ष्य हैं फ्जिनके आधार पर हम यह विश्वास कर सकते हैं कि सातवीं और छठी, विशेष रूप से छठी, शती ई.पू. में भारत और बेबीलोन के बीच समुद्र के रास्ते काफी व्यापार होता था। यह मुख्यतः द्रविड़ों के हाथ में था, यद्यपि आर्य भी भाग लेने लगे थे और चूँकि बाद में भारत के व्यापारी अरेबिया में तथा अफ्रीका के पूर्वी तट पर बस गये और इसके साथ ही चीन के तट पर बस गये थे, हम इसमें शंका नहीं कर सकते कि बेबीलोनिया में भी उनकी बस्तियाँ थीं। लेकिन छठी और सातवीं शताब्दियों में बेबीलोनिया अपने चरम उत्कर्ष पर था। बेबीलोनिया जिसे सैन्काचैरिब ने नष्ट कर दिया था और सरहैडोन ने जिसका पुनः निर्माण किया, बेबीलोनिया जो केवल अपने मंदिरों के लिए जाना जाता था, अब अकस्मात विश्व का सबसे बड़ा बाजार बन गया प्रतीत हो रहा था। उसकी शक्ति की कोई सीमा नहीं थी। उसका तेजी से उत्थान हुआ और उसने अपने पुराने विरोधी एवं अत्याचारी नायनैवेह का तख्ता उलट दिया। नैबूचाडनैजार के सहारे वह संसार का आश्चर्य बन गया। लेकिन उसके महान होने का राज पूर्व के खजानों पर उसका एकाधिकार होना, नालडिया के लोगों का उनके जहाजों में शोरगुल और पूर्व के फुर्तीले लोगों का उनके यहाँ बराबर आना-जाना था। इससे दूसरे राष्ट्र ईर्ष्या करने लगे। पहाराओह नैको

  1. ई.जे. सिगोबस, प्रिमिटिव सिविलाइजेशन, भाग-1, पृष्ठ 545

  2. जे. केनेडी, जे.आर.ए.एस. 1898, पृष्ठ 270-1