अध्याय-1 : प्राचीन भारतीय वाणिज्य - Page 32

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(612µ596 ई.पू.) ने उस नहर को दुबारा खुलवाने के लिए गर्व से अपनी प्रजा की बलि चढ़ा दी जिसे सेटी ने नील नदी से लाल सागर तक बनवाया था, और व्यापार के लिए नयी दुनिया खोजने की उम्मीद से अफ्रीका के चारों ओर अपने फोनेसिया के जहाजों का बेड़ा भेजा। इससे पूर्व, एक ओर स्पेन और पुर्तगाल के लोगों में और दूसरी ओर बेबीलोनिया और मिस्र के बीच भारत का खजाना पाने के लिए प्रतिद्वंद्विता चल रही थी।य् ख्2, इन वाणिज्यिक संबंधों ने भारत के साहित्य पर निश्चित रूप से प्रभाव डाला। समुद्र की काफी भूमिका रही और भीमकाय ‘मोकर’ का बराबर जिक्र आता था। वैदिक देवी-देवता पृष्ठभूमि में चले गये और हिंदू मस्तिष्क ने सृष्टि की उत्पत्ति के बारे में ऊँची उड़ानें भरीं, उनके ये ईजाद विष्णु पुराण में पाये जाते हैं जिसमें कहा गया है कि, फ्सर्वोच्च शक्ति ने पृथ्वी को समुद्र के ऊपर रखा जहाँ वह एक विशाल नौका की भाँति तैरती है और अपने विस्तृत सतह से पानी के अंदर डूबती नहीं है।य् सम्पूर्ण साहित्य से वाणिज्यिकता की गद्य आती है और तत्त्वतः यह आदिकालीन वैदिक साहित्य से भिन्न है। यहाँ तक कि प्रोफेसर मैक्समूलर ने अपनी फ्हिस्ट्री ऑफ एन्सिएन्ट संस्कृत लिटरेचरय् में कहा है कि फ्सभी ब्राह्मणों में मूल वैदिक भजनों के बारे में इतनी अधिक गलत धारणा है कि हम समझ नहीं पाते कि परम्परा के क्रम में अकस्मात् प्रबल दरार आये बिना ऐसी विरक्ति कैसे हो सकती है। यह विरक्ति विदेशी प्रभाव से हुई, जिसका कारण वाणिज्य था।य् अतः भारत पर यह विदेशी प्रभाव छठी, सातवीं और आठवीं शताब्दियों में और निश्चित रूप से महात्मा बुद्ध के समय अथवा उससे पूर्व पड़ा, क्योंकि महात्मा बुद्ध ने देखा कि भारत के सभी लोग पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं, पर वह वैदिक सिद्धांत नहीं है। और इसलिए निश्चित तौर पर यह दूसरे देशों से आया होगा। ख्1, तथापि यह नहीं मान लेना चाहिए कि हिंदुओं की समुद्री गतिविधियाँ इस समय से आरम्भ हुई, तब तक हिंदुओं के लिए समुद्री यात्रा एक आम बात हो गयी थी। दिघ केवद्धू सूत्त (पांचवी शताब्दी ई. पू.) में बुद्ध ने उपमा के रूप में कहा है फ्बहुत पहले जब व्यापारियों ने समुद्र से जाना शुरू किया तो वे अपने साथ तट पहचानने वाले पक्षी ले जाते थे। जब व्यापारियों को जहाज से जमीन दिखाई नहीं देती थी तो वे तट पहचानने वाले पक्षी को खुला छोड़ देते थे। पक्षी उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम तथा बीच के स्थानों पर जाता था और ऊपर चक्कर लगाता था। यदि आकाश से उसे जमीन दिखाई देती, तो वहाँ से पक्षी पुनः जहाज पर चला जाता था। ठीक ऐसे ही बंधु रहीस डैविडस का कहना है कि आम बातचीत में इस प्रकार की बात तभी की जा सकती है, जब इस तरह की चीजें प्रचलित हों और आम लोगों को इनकी जानकारी हो। ख्2,

  1. रैवरेड जोहेव एडकिंस, जे.आर.ए.एस. 1886, पृष्ठ 6

  2. जे.आर.ए.एस. खंड 31, पृष्ठ 432