अध्याय-1 : प्राचीन भारतीय वाणिज्य - Page 34

19

सिकंदर का कुछ भी उद्देश्य रहा हो, यह निश्चित है कि वह भारत से भलीµभाँति परिचित था और दोनों देशों के बीच घनिष्ट वाणिज्यिक सम्बन्ध विकसित करने की बात उसके मन में थी। सिकंदर ने देखा कि भारत के इस धनी व्यापार पर जयरे के फोनीसिन्स का एकाधिकार है जो संसार के शेष देशों में भारत का माल भेजते हैं। फोनीसिन्स के प्रति उसकी ईर्ष्या भारत की सम्पन्नता के बारे में जानकारी होने पर और बढ़ गयी। भारत आने से पूर्व वह जिस देश में गया था वह घनी आबादी वाला था और वहाँ अच्छी खेती होती थी इसके साथ ही प्राकृतिक सम्पदा तथा कला की उतनी ही भरमार थी जितनी भारत के उस भाग की, वहाँ वह अपनी सेना लेकर पहुँचा था। लेकिन जब उसको प्रत्येक स्थान पर, सम्भवतया बढ़ा-चढ़ा कर, बताया गया कि गंगा के किनारे जितना आगे भारत में जाएँगे उतना अधिक सम्पन्न क्षेत्र मिलेगा, तो यह आश्चर्यजनक नहीं है कि भारत के उन क्षेत्रों को देखने और उनको अपने अधिकार में लेने की उसकी लालसा बढ़ गयी। इससे प्रेरित होकर उसने अपने सिपाहियों को एकत्र किया और आदेश दिया कि उस क्षेत्र की ओर कूच करें जहाँ धन, प्रभुत्व और कीर्ति उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। ख्1, भारत का उत्तरी भाग जो सिकंदर ने जीता उसे उसने अपने साथी पोरस को दे दिया। कहा जाता है कि इस क्षेत्र में कम-से-कम 4000 नगर थे। श्री राबर्टसन का कहना है कि इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि इस क्षेत्र की आबादी बहुत अधिक थी। सिकंदर का जहाजी बेड़ा जब सिंध नदी से होते हुए नीचे की ओर आया तो उसने पाया कि नदी के दोनों ओर की भूमि किसी भी दशा में उस क्षेत्र की भूमि से खराब नहीं थी जिसकी सत्ता पोरस को सौंपी गयी थी। ख्2,

उसके सेनापतियों प्टोलैमी, अरिस्टोवूलस तथा नियरचुस के संस्मरणों या रोजनामचों से भारत के बारे में जानकारी यूनान को और यूनान से यूरोप को मिली। मिस्र को जीतने के बाद सिकंदर ने भारत और यूनान के बीच सीधा व्यापार आरम्भ करने का विचार बनाया। इस उद्देश्य से उसने अपने नाम से अलेक्जेंड्रिया नगर बसाया जो प्राचीन काल में व्यापार की बहुत बड़ी मंडी बन गया और अनेक उतार-चढ़ाव के बावजूद भी वैसा ही बना रहा। उसने स्थाई तौर पर भारत को अपने साम्राज्य से जोड़ने के सपनों को संजोया था। उसके सारे ना सही कुछ सपने तो पूरे हो जाते यदि उसकी उम्र लम्बी होती। दुर्भाग्यवश अपना साम्राज्य स्थापित करने के कुछ समय के बाद ही सिकंदर का देहांत हो गया और उसके बाद थोड़े समय में ही साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया। विभिन्न प्रदेशों के गवर्नरों ने पूरे साम्राज्य को आपस में बाँट लिया। अपने-अपने साम्राज्य को बढ़ाने की आकांक्षा, प्रतिस्पर्धा तथा व्यक्तिगत शत्रुता के वशीभूत होकर उनका आपस में युद्ध हुआ।

  1. डब्ल्यू. राबर्टसन, ‘डिस्क्विजिशन’, पृष्ठ 16-17

  2. डब्ल्यू. राबर्टसन, ‘डिस्क्विजिशन’, पृष्ठ 22