अध्याय-1 : प्राचीन भारतीय वाणिज्य - Page 35

20 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

यह कल्पना करना गलत होगा कि भारत और यूनान के बीच व्यापार सम्बन्ध सिकंदर के साम्राज्य के पतन के कारण समाप्त हो गये। वस्तुतः इसके विपरीत हुआ, दोनों देशों के सम्बन्ध निकटतर बने। सिकंदर के अत्यंत उद्यमी तथा महत्त्वाकांक्षी सेनापति सेल्यूकस ने फारस का उपनिवेश अपने अधिकार में लेने के पश्चात् सिकंदर द्वारा भारत के जीते प्रांतों को अपने प्रभुत्व में लाने का प्रयत्न किया। सेल्यूकस जानता था कि इस जीत से व्यापारिक लाभ होंगे और इस योजना को वह अपनी बड़ी फौज के सहारे मूर्तरूप देना चाहता था। लेकिन उसके विरोधी उससे अधिक शक्तिशाली थे। उदार शासक चंद्रगुप्त उस समय भारत पर राज्य कर रहा था। सब ओर फैली रूढि़वादिता के बीच वही एक ऐसा शासक था जिसके पास दिमाग और बाहुबल दोनों थे और जिसके विचार आधुनिक थे। सेल्यूकस ने अपने शत्रु की शक्ति को समझ लिया और बुद्धिमत्ता से शान्ति समझौता करने का निश्चय किया। उसने दोनों देशों के बीच मैत्री सम्बन्ध बढ़ाने का निश्चय किया। उसने चंद्रगुप्त के दरबार में मैगास्थनीज को एक राजदूत के रूप में भेजा। मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाये रखने के लिए मैगास्थनीज के पश्चात् डायमैच्युस ने मैत्री सम्बन्ध बनाये रखा। ग्रीसो बैक्टरियन राज्य के माध्यम से यूनानियों ने भारत से अपना सम्बन्ध बहुत समय तक बनाये रखा था, यद्यपि इसके विस्तार और ब्योरे के बारे में अनुमान लगाने के लिए हमारे पास बहुत कम साधन हैं। चीन के इतिहासकार हमें बताते हैं कि ईसा सें लगभग एक सौ छब्बीस वर्ष पूर्व तातारों का एक शक्तिशाली समूह अपने स्थान, अपने समूह से चीन के समीप आ पहुँचा तथा अपने पीछे रह गये शक्तिशाली दबाव से पश्चिम की ओर बढ़ा और टैक्सरटीज को पार करके मूसलाधार बारिश की भाँति बैक्ट्रिया पर बरस पड़ा। उस राज्य पर अधिकार कर लिया और वहाँ पर यूनानियों के प्रभुत्व को समाप्त कर दिया। उस समय तक यूनानियों को वहाँ अपना प्रभुत्व स्थापित किये लगभग 130 वर्ष हो चुके थे। ख्1, इस प्रकार यद्यपि सड़क मार्ग से व्यापार में व्यवधान हुआ, तथापि अलेक्जेंड्रिय, यूनान और भारत के बीच समुद्र के रास्ते आने वाले माल का बाजार बना रहा। लागुस के पुत्र पटोलमी ने अपने गवर्नर काल में भारत से व्यापार को बहुत बढ़ावा दिया। उसके पुत्र पटोलमी फिलेडैलप्Qस ने भारत का सामान सीधे अलेक्जेंड्रिया ले जाने के लिए लाल सागर और नील नदी को जोड़ने वाली एक नहर बनवानी आरम्भ की, यद्यपि यह योजना बहुत बड़ी थी और बीच में ही छोड़ दी गयी। परन्तु उसने लाल सागर के पश्चिमी तट पर एक नगर बसाया जिसका नाम बैरेनाइस रखा और वह भारत के व्यापार की मंडी बना रहा।

लेकिन जब कि मिस्र तथा सीरिया के शासकों ने भारत के साथ व्यापार के सभी लाभ अपनी प्रजा के लिए सुनिश्चित करने का जोश और उत्साह से प्रयास किया, पश्चिम में एक शक्ति का उदय हुआ जो दोनों के लिए घातक सिद्ध हुई। रोमवासी अपनी फौजी

  1. डब्ल्यू. राबर्टसन, ‘डिस्क्विजिशन’, पृष्ठ 37