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शक्ति और राजनैतिक चेतना के द्वारा इटली व सिसली के स्वामी बन गये और शीघ्र ही विरोधी कारथेग गणतंत्र का तख्ता पलट दिया। उन्होंने ई.पू. 55 मेसीडोनिया तथा यूनान को अपने अधिकार में ले लिया और सीरिया तक अपना साम्राज्य बढ़ा लिया और अंत में मिस्र को जीतने के लिए मिस्र के विरुद्ध हथियार उठा लिये जो सिकंदर-ए-आजम के उत्तराधिकारियों द्वारा स्थापित राज्यों में से बचा एकमात्र राज्य था।
मिस्र की अधीनता के बाद, भारत से लाभप्रद व्यापार, रोम में किये जाने लगा। लेकिन यही एकमात्र रास्ता नहीं था। भारत की चीजें, पश्चिम में ले जाने के लिए एक अन्य व्यापारिक मार्ग भी था। यह एक स्थलीय मार्ग था, जिसे सोलोमन ने भारतीय व्यापार को जूडिया में केंद्रित करने के लिए, नियत किया था। यह मार्ग टैडमोर या डालमाइरा नगरों से गुजरता था, जो यूफ्रेटिस तथा भूमध्य सागर के बीच स्थित थे। रोमवासियों द्वारा सीरिया की अधीनता के बाद, पालमाइरा स्वतंत्र हो गया और अच्छी आबादी वाले संपन्न शहर के रूप में उभरने लगा। वह एक वितरण केंद्र बन गया। लेकिन रोमवासियों के लोभ की कोई सीमा नहीं थी। जेनोबिया की ओर से, पालमाइरा की रानी द्वारा, जरा-सी अनबन का संकेत मिलते ही, रोमवासियों ने उस शहर पर कब्जा करके, उसे अपने साम्राज्य में शामिल कर लिया।
लेकिन भारत के व्यापार पर एकाधिकार करने के लिए पालमिरा का अपने राज्य में मिलाना ही काफी नहीं था। पूर्व में एक और समान रूप से शक्तिशाली राज्य का उदय हो रहा था। पार्थियान्स ने मध्य एशिया पर अधिकार कर लिया था और अपने साम्राज्य की सीमाएँ रोम तक फैला ली थीं। पार्थियान और रोम के बीच लड़ाई 55 से 20 ई.पू. तक चली किंतु प्रभुत्व का निर्णय नहीं हो सका। 55 से 20 ई.पू. के युद्ध के कारण दोनों साम्राज्यों ने एक-दूसरे के सम्मुख गर्दन झुका दी तो एबीसीनिया उसी अनुपात में फलने-फूलने लगा जिसमें उसके पुराने शत्रु का पतन हुआ। यदि यही स्थिति चलती रहती तो बाद का घटनाक्रम बदल जाता। इस्लाम का उदय ही न हुआ होता और वृहद रोम ने थेम्स से गंगा तक अपने साम्राज्य और कानून एवं सरकार को फैला लिया होता। लेकिन इतिहास के तर्क बहुत शक्तिशाली होते हैं। धीरे-धीरे वह खजाना जो रोम के हाथ लगा था जीते गये प्रांतों के विद्रोह को दबाने में, और अपने देश में गृह युद्ध को दबाने में तथा पूर्व के साथ प्रतिकूल व्यापार असंतुलन होने के कारण पूर्व को भुगतान करने में खर्च होने लगा। इस प्रतिकूल व्यापार संतुलन के कारण रोम की अर्थव्यवस्था पर बहुत प्रतिकूल प्रभाव पड़ा क्योंकि रोम ने उत्पादन अथवा उद्योग में कोई सराहनीय प्रगति नहीं की थी जिससे कि नये धन का सृजन किया जा सकता। ख्1,
जहाँ तक भारत के साथ रोम के व्यापार का सम्बन्ध है, हमारे पास जानकारी के भंडार हैं यद्यपि वे विवाद रहित नहीं हैं।
- लुप्त